पेट भरे हो तो ही ये मजहब नजर आते हैं
भुखे को मंदिर मस्जिद कब नजर आते हैं
जिंदगी में भुख ये कितने तमाशे करती है
चौराहे नौनिहाल के करतब नजर आते हैं
मुफलिस झोपड़ी में खिड़कियाँ नही होती
सुराखों के दरमियां ही सब नजर आते हैं
टखने छाती से चिपका सो जाता है बेचारा
मांस नही जिस्म में हाड अब नजर आते हैं
आंसू उबालती है मां फिर खाली पतीले में
बच्चे भुख से बिलखते जब नजर आते हैं
हुकूमतें अक्सर ही वादे खिलाती आयी है
खोखले वादों में भुखे साहब नजर आते है
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