रिश्तों का भरम ये पालना नही अच्छा
अपने सिवा कोई अपना नही अच्छा
दे दे कर दर्द वो पुछते है हाल कैसा है
ऐसे आशनाई से आशना नही अच्छा
कोई शिकवा कोई गम कोई याद नही
बेवजह में बैठे बैठे रोना नही अच्छा
कहकशों के दरमियां है दब सी गई वो
सिसकियों के साथ चलना नही अच्छा
बेमतलब की बात से खामोशी बेहतर
बेवक्त बेलिहाज से बोलना नही अच्छा
दिल से मुलाकात हो जिससे भी मिलें
रुखे से जज्बात से मिलना नही अच्छा
वक्त से किरदार न बदले वही बेहतर
पुराना कोई राब्ता भुलना नही अच्छा
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