नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
रिश्तों के दरमियां हूँ पर सबसे जुदा हूँ मैं
ये जिस्मो खाक से कोई खुद को संवार ले
इतना न अपने आप में भी बचा हूँ मैं
मत दो मुझे खैरात में उजाले जरा से तुम
जुगनुओं से न मिटेंगे ये अंधेरा घना हूँ मैं
गुम है शहर से आजकल सुकूं अम्नो चैन
दहशतगर्दी का आलम है सोता कहां हूँ मैं
अंगड़ाई जुल्फ आईना ख्वाब चांद गुलाब
मुफलिसी से टूटके सब ये भुल गया हूँ मैं
इबादत जियारत सजदा मन्नत बेमानी है
उलझी हुई सी जिंदगी उलझा हुआ हूँ मैं
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