रवायतें उम्र भर यूँ भी निभाना पड़ता है
हादसों को भी अक्सर भुल जाना पड़ता है
हंसी सब छिन ली है वक्त की खरासो ने
दबाकर सिसकियों को मुस्कुराना पडता है
नवाबी भूली बिसरी बातें बन कर रह गई
पेट की खातिर ये जिस्म गलाना पड़ता है
कितने अरमानों को सीने में छुपा रखे थे
जरुरतों की खातिर उन्हें भुलाना पड़ता है
जुस्तजू में तेरी दर बदर खुद को किया
तेरे घर होकर ही मेरा आशियाना पड़ता है
टूटी सी पगडंडी देख चंद यादें हरी हो गई
यूँ ही पगडंडी से मेरा गांव पुराना पड़ता है
मसाइल जीस्त में बेवक्त ही आती रहती है
भुला सब मुश्किलें खिलखिलाना पड़ता है
No comments:
Post a Comment