Saturday, 7 March 2020

वो रहबर है बहुत शातिर वो हर मंजर समझता है

वो  रहबर है  बहुत शातिर  वो हर मंजर समझता है
हर इक  मौके  है  लेता भांप हर अवसर समझता है

उसे   मालूम   है   मुद्दों  को   कब   कैसे  पलटना है
वो   पासे   फेंकता  है  मुल्क को  चौसर समझता है

लगा  लेता  है  हर हिसाब  वो  मकतूल कातिल का
वो  हर इक   रंग  है   पहचानता  अंतर  समझता है

वो   दौरे हाल   की   माकूल   रखता   जानकारी  है
हर इक  इमकान  वो  माहिर से  बेहतर  समझता है

हम अपने  मुल्क  को  दर्जा  है  देते  मां  बराबर  ही
अराजक  सोच  वाला  ही  इसे  बस घर समझता है

हमें  है  नाज  अपनी   बुत परस्ती  पर  सिखाता  ये
उसे  भी  प्रेम  करना   तू  जिसे   पत्थर  समझता है

कभी मिलता है तो बस वो सादगी की बात करता है
मेरा  किरदार  भी  मुझको  बड़ा  जोकर समझता है

बड़ा  बेखौफ  सा  रहता  है   मेरे  साथ  वो  अक्सर
मेरा   मासूम  सा   बच्चा   मुझे   पावर   समझता है

मसाइब बन गया है आज कल तक मसअला जो था
सियासत दां  उसे अब अपने हक बेहतर समझता है

खिलाफत में अगर है आज दुनिया क्या हुआ साहब
ये  गुस्सा है  जरा  कुछ  देर  का   शायर  समझता है

जुबां  कुछ और  दिल में  और दोहरेपन जो जीता है
वही  दुनिया के  हर इक तौर को  बेहतर  समझता है

बदलता    रहता   है    गाहे-बगाहे   ही   मुखौटे   वो
वो  खुद को  भूल जाता है  मगर पिक्चर समझता है

सुनाती  हैं   ये  नन्ही  जान  मुर्ति  को  व्यथा  अपनी
समझ  पाता  नही    इंसान  जो  पत्थर   समझता है

Monday, 2 March 2020

लाखों मिलेंगे आपको ऐसी कतार में

लाखों   मिलेंगे    आपको     ऐसी    कतार में
मिलती  नही   कहीं  भी   खुशी  है   उधार में

बर्बादियों  में   मेरे   तो   वो   भी   शरिक  था
गुजरी  है   उम्र   जिसके   फकत  इंतेजार  में

कीमत  हमेशा   ख्वाब  की   ज्यादा  रही  मेरे
औकात    कब    रहे    हैं    मेरे   इख्तियार में

गहरी  कही  है   जो  भी  कही   बात  यार  ने
रख्खा है  क्या  भला  कहो  नफरत में  रार में

हर शख़्स उलझनों में ही उलझा हुआ है जब
फुर्सत है  कौन  जिसके  है  नफरत विचार में

ताजिर  नफरतों  के  कुछ करते हैं मुझपे तंज
निखरा  हूँ   और   तप  के  मैं  यूँ  बार बार में

रिश्तों  के  दरमियाँ    न  यूँ   दीवार   किजिए
है  लुत्फ़  इक  अलग   जरा  अपनों से हार में

रख्खे  है   सर  पे   हाथ    मेरा  श्याम सांवरा
चलती  है     जिंदगी      इसी    दारोमदार  में

खूं से लथपथ ये मुहल्ला ये गली किसने की

खूं से  लथपथ ये मुहल्ला  ये गली किसने की
आह  भी   आज  सिहरने  है लगी किसने की

क्यूँ है  बिगड़े  हुए  हालात  कमी  किसने  की
आज हर शख़्स की आंखों में नमी किसने की

देख  हालात  ये  दहशत  में  है  दहशत  यारों 
खौफ़ ये   नज्र  हमे  आज  अभी  किसने की

हर  जुबां   फूल   बरसते   यहां   देखे   हमने
फिर  बयानों  से  भला  आगजनी किसने की

तू  मुहब्बत  का  था  ताजिर  बड़ा  मेरे  खुदा
तेरी  दौलत  की  बता   राहजनी  किसने  की

उम्र  बीती  है   मुसाफत  में   मगर  दर दर है 
क्यूँ  वो  भटका  है  भला  राहबरी किसने की

बस्तियां   फूंक   के   इमदाद   लगे   देने  वो
ये  रवायत  तो  न थी पहले कभी किसने की

सबको  मालूम  है  ये  बात  सभी मौन है पर
दरमियाँ  दिल  के ये दीवार खड़ी किसने की

क्यूँ है  उतरा  हुआ  बाजार  में चेहरा सबका
झूठ  के  दौर में  हर बात   खरी  किसने  की

क्यूँ  नदारद  है  मुहब्बत  यूँ  दिलों से  लोगों
नेमते  रब  की  यहां  इतनी कमी किसने की

मुल्क  में  अम्नो अमां  दौर  रहे  बस कायम
है  यही  रब जी  दुआ  पूछ  नही किसने की