वो रहबर है बहुत शातिर वो हर मंजर समझता है
हर इक मौके है लेता भांप हर अवसर समझता है
उसे मालूम है मुद्दों को कब कैसे पलटना है
वो पासे फेंकता है मुल्क को चौसर समझता है
लगा लेता है हर हिसाब वो मकतूल कातिल का
वो हर इक रंग है पहचानता अंतर समझता है
वो दौरे हाल की माकूल रखता जानकारी है
हर इक इमकान वो माहिर से बेहतर समझता है
हम अपने मुल्क को दर्जा है देते मां बराबर ही
अराजक सोच वाला ही इसे बस घर समझता है
हमें है नाज अपनी बुत परस्ती पर सिखाता ये
उसे भी प्रेम करना तू जिसे पत्थर समझता है
कभी मिलता है तो बस वो सादगी की बात करता है
मेरा किरदार भी मुझको बड़ा जोकर समझता है
बड़ा बेखौफ सा रहता है मेरे साथ वो अक्सर
मेरा मासूम सा बच्चा मुझे पावर समझता है
मसाइब बन गया है आज कल तक मसअला जो था
सियासत दां उसे अब अपने हक बेहतर समझता है
खिलाफत में अगर है आज दुनिया क्या हुआ साहब
ये गुस्सा है जरा कुछ देर का शायर समझता है
जुबां कुछ और दिल में और दोहरेपन जो जीता है
वही दुनिया के हर इक तौर को बेहतर समझता है
बदलता रहता है गाहे-बगाहे ही मुखौटे वो
वो खुद को भूल जाता है मगर पिक्चर समझता है
सुनाती हैं ये नन्ही जान मुर्ति को व्यथा अपनी
समझ पाता नही इंसान जो पत्थर समझता है