Tuesday, 29 October 2019

इक घर था कल आज मकां है

इक घर था कल आज मकाँ है
कहने   को     रहते    इंसाँ   है

भाई   भाई    का   है   पड़ोसी
पर  आपस  में    बंद   जुबाँ है

हर  मुश्किल    गैरों  से   साझे
अपनो  से  बनती  ही  कहाँ है

बंटवारे  में    सारे     बंट  गये
रिश्तों के   अब   मोल कहाँ है

थाली   लोटा    ग्लास    बंटे है
बंटवारे   में     हर     सामाँ  है

इक   हिस्से    बापू   है   आए
इक  हिस्से  में   आयी  माँ  है

जिस आंगन कल खेले हम थे
आज  खड़ी    दीवार  वहाँ  है

सारे  रिश्ते    ताक  पे   रख्खे
सुन   बहना   हिस्से    दुकाँ है

चिथड़े  चिथड़े  सारी खुशियाँ
किरचे  किरचे  सब  अरमाँ है

बाप  बिचारा  क्या  कर लेता
लाचारी     चेहरे     चस्पाँ   है

अपनो  के   इस   बंटवारे   में
सबसे  ज्यादा     रोयी  माँ  है

Sunday, 27 October 2019

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है 2

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर  वो  माटी के  घर में   माटी का  दीप  हालत पे  रो रहा है

नसीब इन  बिजलियों की देखो  लिबास है  कांच के बदन पर
उधार की  जगमगाती  रौनक  में डूब कर  मन भी  खो रहा है

ये झिलमिलाती  सी  दीप माला  में एक दीपक  जला अकेला
चुनौतियां  दे रहा  अंधेरों  को  अपनी धुन  का  ही वो  रहा है

मगन है दुनिया तो मस्तियों में किसे है परवाह कहाँ हुआ क्या
खबर  पड़ोसी को भी  हुई ना  बगल वो भूखा  क्यूँ सो रहा है

वो  बेसहारा   यतीम    हसरत  भरी   निगाहों से    है  निहारे
सजा है  बाजार   हसरतों का   बेचारा   सपने   संजो   रहा है

रवायतें  है   गरीब  खातिर   अमीर के   मौज   का है  जरिया
ये तीज त्योहार  बन के आफत  ही झुग्गियों को  भिगो रहा है

जरूरतें   कौन  सी  निभाए   किसे  वो  छोड़े    किसे  भुलाए
उधेड़बुन में  यही  वो  कितनी ही  हसरतों को  भी  ढो रहा है

तरस रही हैं  उजाले खातिर  न जाने  कितनी ही  बस्तियां भी
न जाने  सूरज   कहाँ  उगा है   कहाँ  उजाले   वो   बो  रहा है

शहर की मशरूफियत से हट कर  है सादगी का  सुहाना मंजर
गंवार  कहती हैं  जिसको दुनिया  वो गांव  तहज़ीब  ढो रहा है

कहां रही  अब  वो रौनकें भी  कहां वो  पहले से  दिन  रहे अब
बदलते  मौसम में  अब ये  रस्मों  रिवाज   पहचान  खो  रहा है

हुए मुलाकात बरसों बीते कुछ अपनो से हम जो कल थे बिछड़े
कोई  बहाने    न काम   आये    उदास  मन   भर के   रो रहा है

बिछे हुए    फूल    मंदिरों में    बिखर  रही    खुश्बूएं   फिजा में
मिले हैं  कांटे    बेचारगी को    कदम कदम  बस   चुभो  रहा है

Tuesday, 15 October 2019

जमाने में सबसे बुरा आदमी हूँ

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जमाने में सबसे बुरा आदमी हूँ
जरा हूँ मैं इंसा जरा आदमी हूँ

मुकम्मल जरुरत की फेहरिस्त लेकर
मै बाजार को ताकता आदमी हूँ

कभी हसरतों की कबर खोदता हूँ
हकीकत से मै भागता आदमी हूँ

कहां तक करेगा रफूगर रफू अब
कि बस चिथड़े ढांपता आदमी हूँ

धरी आंच पर हर कदम जिंदगी ये
अजाबो से मै जूझता आदमी हूँ

हवाओं के रव में चला जा रहा हूँ
मै बस वक्त को भांपता आदमी हूँ

हिमाकत की हिम्मत न रखता हूँ पर भी
ये शह मात को जानता आदमी हूँ

Thursday, 10 October 2019

राम बनने की सभी में लालसा भरपूर है

राम  बनने  की    सभी में    लालसा  भरपूर है
राम  के  लक्षण से   हर  किरदार  कोसों दूर है

झूठ  मक्कारी  दिखावा  लोभ में  लिपटे  सभी
त्याग    मर्यादा    न संयम   नाम  भी  मंजूर है

फुल कर  कुप्पा  हुए हैं  दंभ से सब इस कदर
बस  बड़ा  दिखने की  चाहत में  ही सारे चूर है

बांटते   फिरते  हैं   साधू संत   मंदिर में  बहुत
घर  में  बैठे  बुढ़े मां  अर बाप  बस  मजबूर हैं

हक तो लेने के  सभी को  याद है इस मुल्क से
जब  निभाना  फर्ज हो  जज़्बे  सभी काफूर है

लाए हैं लिखवा  वसीयत में  शराफत हर कोई
फिर  गलत  ये कौन  करता है समझ से दूर है

फूंकते हर साल सब  रावण को  हर्षोल्लास से
फिर से  जी उठता है वो सदियों से ये दस्तूर है