इक घर था कल आज मकाँ है
कहने को रहते इंसाँ है
भाई भाई का है पड़ोसी
पर आपस में बंद जुबाँ है
हर मुश्किल गैरों से साझे
अपनो से बनती ही कहाँ है
बंटवारे में सारे बंट गये
रिश्तों के अब मोल कहाँ है
थाली लोटा ग्लास बंटे है
बंटवारे में हर सामाँ है
इक हिस्से बापू है आए
इक हिस्से में आयी माँ है
जिस आंगन कल खेले हम थे
आज खड़ी दीवार वहाँ है
सारे रिश्ते ताक पे रख्खे
सुन बहना हिस्से दुकाँ है
चिथड़े चिथड़े सारी खुशियाँ
किरचे किरचे सब अरमाँ है
बाप बिचारा क्या कर लेता
लाचारी चेहरे चस्पाँ है
अपनो के इस बंटवारे में
सबसे ज्यादा रोयी माँ है