Tuesday, 29 October 2019

इक घर था कल आज मकां है

इक घर था कल आज मकाँ है
कहने   को     रहते    इंसाँ   है

भाई   भाई    का   है   पड़ोसी
पर  आपस  में    बंद   जुबाँ है

हर  मुश्किल    गैरों  से   साझे
अपनो  से  बनती  ही  कहाँ है

बंटवारे  में    सारे     बंट  गये
रिश्तों के   अब   मोल कहाँ है

थाली   लोटा    ग्लास    बंटे है
बंटवारे   में     हर     सामाँ  है

इक   हिस्से    बापू   है   आए
इक  हिस्से  में   आयी  माँ  है

जिस आंगन कल खेले हम थे
आज  खड़ी    दीवार  वहाँ  है

सारे  रिश्ते    ताक  पे   रख्खे
सुन   बहना   हिस्से    दुकाँ है

चिथड़े  चिथड़े  सारी खुशियाँ
किरचे  किरचे  सब  अरमाँ है

बाप  बिचारा  क्या  कर लेता
लाचारी     चेहरे     चस्पाँ   है

अपनो  के   इस   बंटवारे   में
सबसे  ज्यादा     रोयी  माँ  है

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