Sunday, 27 October 2019

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है 2

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर  वो  माटी के  घर में   माटी का  दीप  हालत पे  रो रहा है

नसीब इन  बिजलियों की देखो  लिबास है  कांच के बदन पर
उधार की  जगमगाती  रौनक  में डूब कर  मन भी  खो रहा है

ये झिलमिलाती  सी  दीप माला  में एक दीपक  जला अकेला
चुनौतियां  दे रहा  अंधेरों  को  अपनी धुन  का  ही वो  रहा है

मगन है दुनिया तो मस्तियों में किसे है परवाह कहाँ हुआ क्या
खबर  पड़ोसी को भी  हुई ना  बगल वो भूखा  क्यूँ सो रहा है

वो  बेसहारा   यतीम    हसरत  भरी   निगाहों से    है  निहारे
सजा है  बाजार   हसरतों का   बेचारा   सपने   संजो   रहा है

रवायतें  है   गरीब  खातिर   अमीर के   मौज   का है  जरिया
ये तीज त्योहार  बन के आफत  ही झुग्गियों को  भिगो रहा है

जरूरतें   कौन  सी  निभाए   किसे  वो  छोड़े    किसे  भुलाए
उधेड़बुन में  यही  वो  कितनी ही  हसरतों को  भी  ढो रहा है

तरस रही हैं  उजाले खातिर  न जाने  कितनी ही  बस्तियां भी
न जाने  सूरज   कहाँ  उगा है   कहाँ  उजाले   वो   बो  रहा है

शहर की मशरूफियत से हट कर  है सादगी का  सुहाना मंजर
गंवार  कहती हैं  जिसको दुनिया  वो गांव  तहज़ीब  ढो रहा है

कहां रही  अब  वो रौनकें भी  कहां वो  पहले से  दिन  रहे अब
बदलते  मौसम में  अब ये  रस्मों  रिवाज   पहचान  खो  रहा है

हुए मुलाकात बरसों बीते कुछ अपनो से हम जो कल थे बिछड़े
कोई  बहाने    न काम   आये    उदास  मन   भर के   रो रहा है

बिछे हुए    फूल    मंदिरों में    बिखर  रही    खुश्बूएं   फिजा में
मिले हैं  कांटे    बेचारगी को    कदम कदम  बस   चुभो  रहा है

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