Friday, 30 September 2016

खुद को उम्र भर अख़बार किया है हमने

खुद को उम्र भर अख़बार किया है हमने
अपने वजूद का  इश्तेहार किया है हमने

धूप छांव के खेल खेलती रही है जिंदगी
खुशी बेचने का  कारोबार किया है हमने

सिसकती मिली उम्मीदें हसरतें ख्वाहिशें
कुछ यूँ अपने को  लाचार किया है हमने

टपकते है आंसू  टूटे फुटे  उन छप्परों से
रिश्तों को टूटने से  इंकार  किया है हमने

चार दीवारें है घर में दरकती सीलन भरी
हिफाजते खुद को दीवार किया है हमने

ये और बात है कि हम समझ नही  पाये
देर तक जिंदगी का दीदार किया है हमने

पुराने जख्मों के टांके  फिर  खुल गये हैं
दर्द सहने खुद को  तैयार किया है हमने

बेलुफ्त बेसबब तू  गुजर रही थी जिंदगी
तेरे हक में अहम किरदार किया है हमने

Thursday, 22 September 2016

हमको जीने का तरीका क्यूँ नहीं मिलता

हमको जीने का तरीका  क्यूँ नहीं मिलता
गिरके फिर उठे ये मौका क्यूँ नहीं मिलता

राहत सुकून तसल्लियां भी तो मिले कभी
कुछ दर्द अश्क के सिवा क्यूँ नहीं मिलता

आदमी जो भी मिला  गमों से था लबरेज
कोई भी मुस्कुराता हुआ क्यूँ नहीं मिलता

उसूलों इमां की कीमत पे बसर है जिंदगी
जमीर कहीं जागा हुआ  क्यूँ नहीं मिलता

बे लुफ्त, बे सबब,  बे-इरादा  भी बेशुमार
मुझमें कुछ मुकम्मल सा क्यूँ नहीं मिलता

तमाम गिरहें खुलती जाती है हर सांस पर
मुझमे कोई नया तमाशा क्यूँ नहीं मिलता

मुकद्दर  चांद का  बिल्कुल  अपने जैसा है
तन्हा सा है फिर भी वो तन्हा नही मिलता

अरमानों के जलने की बू आती ही रहती है
सुलगती है सांसे   धुंआ  क्यूँ  नहीं मिलता