हमको जीने का तरीका क्यूँ नहीं मिलता
गिरके फिर उठे ये मौका क्यूँ नहीं मिलता
राहत सुकून तसल्लियां भी तो मिले कभी
कुछ दर्द अश्क के सिवा क्यूँ नहीं मिलता
आदमी जो भी मिला गमों से था लबरेज
कोई भी मुस्कुराता हुआ क्यूँ नहीं मिलता
उसूलों इमां की कीमत पे बसर है जिंदगी
जमीर कहीं जागा हुआ क्यूँ नहीं मिलता
बे लुफ्त, बे सबब, बे-इरादा भी बेशुमार
मुझमें कुछ मुकम्मल सा क्यूँ नहीं मिलता
तमाम गिरहें खुलती जाती है हर सांस पर
मुझमे कोई नया तमाशा क्यूँ नहीं मिलता
मुकद्दर चांद का बिल्कुल अपने जैसा है
तन्हा सा है फिर भी वो तन्हा नही मिलता
अरमानों के जलने की बू आती ही रहती है
सुलगती है सांसे धुंआ क्यूँ नहीं मिलता
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