Sunday, 29 December 2019
बारहा कैसे ये किरदार बदल ले अपना
Saturday, 28 December 2019
अब इधर या उधर से खारिज है
Thursday, 26 December 2019
दर्द देकर मुस्कुराना छोड़ दो
सत्ता की सब रेस है लाला
मीर की गजलें सुनाना छोड़ दो
तैश में यूँ घर जलाना छोड़ दो
शिकायतों से भरी बद जुबान थोड़ी है
हमें दिल लगाने इजाजत नही है
छोड़िए फिक्र क्या किजिए
फिरका वहशत है चार सू देखो
Wednesday, 4 December 2019
मुकद्दर की फकत बदमाशियाँ अच्छी नही लगती
मुकद्दर की फकत बदमाशियाँ अच्छी नही लगती
ये हर पल चश्मे तर गुस्ताखियाँ अच्छी नही लगती
खुशी का तजकिरा भी ख्वाब सा लगने लगा अब तो
हमे हर वक्त अब मजबूरियाँ अच्छी नही लगती
नदारद है मेरा किरदार ही मेरी कहानी से
मुकद्दर की यही गुस्ताखियाँ अच्छी नही लगती
मुकर्रर है फकत दो गज मेरी भी मिल्कियत साहब
सदा बस मुफलिसी की यारियाँ अच्छी नही लगती
लबों से छिन लो इकबाल के कौमी तराने को
फसादी दौर में लफ्फाजियाँ अच्छी नही लगती
कभी उम्मीद से अच्छा जरा वो कर भी सकता है
अब इतनी आजकल अच्छाइयाँ अच्छी नही लगती
सियासत के पतीले पर फकत जज्बात पकते है
सिसकती कांपती लाचारियाँ अच्छी नही लगती
रवैया देख बच्चों के हुआ अहसास बापू को
कि बारीश थमने पर फिर छतरियाँ अच्छी नही लगती
गुजर पाता नही इक हादसा दूजा चला आता
उसे बेखौफ मेरी बच्चियाँ अच्छी नही लगती
बदन तो धूप चखता है मगर दिल प्यार का प्यासा
भरे मन ख्वाब की दुश्वारियाँ अच्छी नही लगती
निकल पड़ता है अल सुब्ह ही सूरज अपनी ड्यूटी में
उसे बे बात लापरवाहियाँ अच्छी नही लगती
बदन और जेब पर कुछ बोझ ही बढ़ता है बेमतलब
बिचारे मुफलिसों को सर्दियाँ अच्छी नही लगती
Saturday, 2 November 2019
दिल फरेबी झुठे इश्तेहार से डर लगता है
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दिल फरेबी झुठे इश्तेहार से डर लगता है
आजकल हमको ये बाजार से डर लगता है
बेचते रोज जरूरत के लिए हसरत को
अपने दोहरे से ये किरदार से डर लगता है
झुग्गियों में है अंधेरा सा अभी तक कायम
जगमगाते हुए त्योहार से डर लगता है
फिर वही लूट फसादों की खबर अल सुब्ह
अब तो इस रोज के अखबार से डर लगता है
जैसे कठपुतली है हाथ सियासत के वो
मुब्तिला आज के फनकार से डर लगता है
मुल्क में दैर हरम मौका परस्ती बस है
पिस रहे लोग ये व्यापार से डर लगता है
मुफलिसी बेबसी से तंग है आवाम यहां
देख हालात ये लाचार से डर लगता है
रोज वादे ही खिलाती है वजीफा कह कर
अब तो इस मुल्क की सरकार से डर लगता है
Tuesday, 29 October 2019
इक घर था कल आज मकां है
इक घर था कल आज मकाँ है
कहने को रहते इंसाँ है
भाई भाई का है पड़ोसी
पर आपस में बंद जुबाँ है
हर मुश्किल गैरों से साझे
अपनो से बनती ही कहाँ है
बंटवारे में सारे बंट गये
रिश्तों के अब मोल कहाँ है
थाली लोटा ग्लास बंटे है
बंटवारे में हर सामाँ है
इक हिस्से बापू है आए
इक हिस्से में आयी माँ है
जिस आंगन कल खेले हम थे
आज खड़ी दीवार वहाँ है
सारे रिश्ते ताक पे रख्खे
सुन बहना हिस्से दुकाँ है
चिथड़े चिथड़े सारी खुशियाँ
किरचे किरचे सब अरमाँ है
बाप बिचारा क्या कर लेता
लाचारी चेहरे चस्पाँ है
अपनो के इस बंटवारे में
सबसे ज्यादा रोयी माँ है
Sunday, 27 October 2019
अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है 2
अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर वो माटी के घर में माटी का दीप हालत पे रो रहा है
नसीब इन बिजलियों की देखो लिबास है कांच के बदन पर
उधार की जगमगाती रौनक में डूब कर मन भी खो रहा है
ये झिलमिलाती सी दीप माला में एक दीपक जला अकेला
चुनौतियां दे रहा अंधेरों को अपनी धुन का ही वो रहा है
मगन है दुनिया तो मस्तियों में किसे है परवाह कहाँ हुआ क्या
खबर पड़ोसी को भी हुई ना बगल वो भूखा क्यूँ सो रहा है
वो बेसहारा यतीम हसरत भरी निगाहों से है निहारे
सजा है बाजार हसरतों का बेचारा सपने संजो रहा है
रवायतें है गरीब खातिर अमीर के मौज का है जरिया
ये तीज त्योहार बन के आफत ही झुग्गियों को भिगो रहा है
जरूरतें कौन सी निभाए किसे वो छोड़े किसे भुलाए
उधेड़बुन में यही वो कितनी ही हसरतों को भी ढो रहा है
तरस रही हैं उजाले खातिर न जाने कितनी ही बस्तियां भी
न जाने सूरज कहाँ उगा है कहाँ उजाले वो बो रहा है
शहर की मशरूफियत से हट कर है सादगी का सुहाना मंजर
गंवार कहती हैं जिसको दुनिया वो गांव तहज़ीब ढो रहा है
कहां रही अब वो रौनकें भी कहां वो पहले से दिन रहे अब
बदलते मौसम में अब ये रस्मों रिवाज पहचान खो रहा है
हुए मुलाकात बरसों बीते कुछ अपनो से हम जो कल थे बिछड़े
कोई बहाने न काम आये उदास मन भर के रो रहा है
बिछे हुए फूल मंदिरों में बिखर रही खुश्बूएं फिजा में
मिले हैं कांटे बेचारगी को कदम कदम बस चुभो रहा है
Tuesday, 15 October 2019
जमाने में सबसे बुरा आदमी हूँ
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जमाने में सबसे बुरा आदमी हूँ
जरा हूँ मैं इंसा जरा आदमी हूँ
मुकम्मल जरुरत की फेहरिस्त लेकर
मै बाजार को ताकता आदमी हूँ
कभी हसरतों की कबर खोदता हूँ
हकीकत से मै भागता आदमी हूँ
कहां तक करेगा रफूगर रफू अब
कि बस चिथड़े ढांपता आदमी हूँ
धरी आंच पर हर कदम जिंदगी ये
अजाबो से मै जूझता आदमी हूँ
हवाओं के रव में चला जा रहा हूँ
मै बस वक्त को भांपता आदमी हूँ
हिमाकत की हिम्मत न रखता हूँ पर भी
ये शह मात को जानता आदमी हूँ
Thursday, 10 October 2019
राम बनने की सभी में लालसा भरपूर है
राम बनने की सभी में लालसा भरपूर है
राम के लक्षण से हर किरदार कोसों दूर है
झूठ मक्कारी दिखावा लोभ में लिपटे सभी
त्याग मर्यादा न संयम नाम भी मंजूर है
फुल कर कुप्पा हुए हैं दंभ से सब इस कदर
बस बड़ा दिखने की चाहत में ही सारे चूर है
बांटते फिरते हैं साधू संत मंदिर में बहुत
घर में बैठे बुढ़े मां अर बाप बस मजबूर हैं
हक तो लेने के सभी को याद है इस मुल्क से
जब निभाना फर्ज हो जज़्बे सभी काफूर है
लाए हैं लिखवा वसीयत में शराफत हर कोई
फिर गलत ये कौन करता है समझ से दूर है
फूंकते हर साल सब रावण को हर्षोल्लास से
फिर से जी उठता है वो सदियों से ये दस्तूर है
Sunday, 22 September 2019
है ये राहत की खबर मसनदे साही के लिए
है ये राहत की खबर मसनदे साही के लिए
उसपे उंगली न उठी कोई तबाही के लिए
राहतें खूब बंटी मुल्क में बस कागज पर
मुर्दे उठकर के नही आए गवाही के लिए
रोज दम तोड़ती बेचैन तमन्ना बेबस
कुछ ये कमबख्त जरूरत के पनाही के लिए
जिनके कांधों पे हिफाजत की है जिम्मेदारी
महकमा खूब है मशहूर उगाही के लिए
कांप उट्ठो न कभी देख के अखबार कहीं
अपने मेयार गिराओ न इलाही के लिए
मसअला अब यहां कोई कहाँ हल होता है
सब्ज रखते हैं हर इक जख्म सदा ही के लिए
जुर्म को डर नही कानून अदालत का कोई
हर मशक्कत है यहां बस बेगुनाही के लिए
और लफ्जों को करो तल्ख चुभाओ नश्तर
शोर दस्तूर है हर पल खैर ख्वाही के लिए
गुदगुदाते हुए अहसास न मैं लिख पाया
मन हो भारी तो लिखूं कैसे ह हा ही के लिए
अजीज बनते थे कल जो सारे न जाने अब वो किधर गये हैं
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अजीज बनते थे कल जो सारे न जाने अब वो किधर गये हैं
जरा सी मुश्किल घड़ी जो आयी तमाम रिश्ते बिखर गये हैं
कहा जो करते थे साथ देने की उम्र भर हर मुसीबतों में
बचा के दामन निकल गये वो मुसीबतें देख डर गये हैं
न हमने हारी कभी भी हिम्मत हरिक हालात को जिया है
बड़े ही कमजोर दिल थे वो सब मिला अंधेरा सिहर गये हैं
निखर निखर के निकल के आया तपा है जितना वजूद अपना
खराब माटी थे कल को गौहर के जैसे अब हम संवर गये हैं
भुलावे भर हैं तमाम रिश्ते न काम आते कोई समय पर
यकीन कायम किया है खुद पर फरेब खाकर सुधर गये हैं
हालात जरा बद है ये बदतर तो नही है
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हालात जरा बद है ये बदतर तो नही है
है शुक्र किसी हाथ में पत्थर तो नही है
कुछ लोग खफा हैं जरा सिस्टम से यहां पर
ये मामला है घर का कोई डर तो नही है
है फिक्र में सरकार न तु फिक्र जरा कर
फाका कशी दो चार ये दुष्कर तो नही है
गर झांकता है शम्स सुराख़ो से हुआ क्या
छप्पर है तेरे सर पे तु बेघर तो नही है
हर एक निवाले पे नजर हुक्मरां की है
कुछ कह रहे हैं ये कोई महशर तो नही है
जमहूर जमुरे की तरह नाच रहा है
अच्छे दिनों से ये कोई कमतर तो नही है
लगता है उसे दोष सभी लड़कियों में है
घर उसके पता कर जरा दुख्तर तो नही है
मिलने को चले आए हैं कुछ रब्त पुराने
तस्कीन करो पहलू में खंजर तो नही है
बस आग उगलते है सहर शाम तलक वो
देखो तो कहीं पेट में अख्तर तो नही है
ख्वाहिश है सभी दर्द मै गंगा में बहा दूं
पर दिल से है निस्बत कोई बेघर तो नही है
नाकामियों से खौफ न खा हौसला तु रख
मंजिल की है तु राह में दर दर तो नही है
घबराए से कुछ लोग यकीनन है यहां पर
इतनी ही गनीमत है वो थर थर तो नही है
Tuesday, 17 September 2019
ख्वाब देखूंगा तो अखबार में आ जाएगा
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ख्वाब देखूंगा तो अखबार मे आ जायेगा
कुछ हकीकत सरेबाजार मे आ जायेगा
सांस लेता हूँ जमाने से छिपा कर के मै
वरना कल को वो भी इश्तेहार में आ जायेगा
मै हूँ मुफलिस इक मुद्दा हूँ सियासत के लिए
तंग हालात भी दरकार में आ जायेगा
हर निवाले पे नजर मेरी रखी जायेगी
मेरा किरदार सरोकार में आ जायेगा
बेबसी बिकने लगेंगी मेरी चौराहों पर
मेरा ये जिस्म भी व्यापार में आ जायेगा
मेरे कांधो पे ही चढ़ कर के शहर का लुच्चा
देख लेना अब कि सरकार में आ जायेगा
ऐ सुखनवर तू न गुस्ताखी यूँ कर रहने दे
राएगा तु भी गुनहगार में आ जायेगा
है अभी अलहदा किरदार जुदा है सबसे
तू भी इस शहर के संस्कार में आ जायेगा
Monday, 16 September 2019
बहुत करीब से गुजरी है अजनबी की तरह
बहुत करीब से गुजरी है अजनबी की तरह
ये जिंदगी न मिली हमसे जिंदगी की तरह
तमाम उम्र उदासी के दरमियां गुजरी
लगे हैं अब ये उदासी कोई खुशी की तरह
अधुरा चांद लगे मेरा कोई हमसाया
अधूरापन ये लगे अब तो बेबसी की तरह
नजर को ख्वाब न दो आज अब उजालों के
लगे हैं अब ये उजाले भी तिरगी की तरह
हरेक सांस लगे हैं लगान के जैसे
गुजरते उम्र के हर लम्हे खुदखुशी की तरह
कि बदहवास चली जा रही हैं उम्मीदें
दिखे हैं मोड़ पे कुछ चीज रोशनी की तरह
Saturday, 7 September 2019
नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
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नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
रिश्तों के दरमियां ही हूँ सबसे जुदा हूँ मैं
ये जिस्मो खाक से कोई खुद को संवार ले
इतना न अपने आप में भी अब बचा हूँ मैं
मत दो मुझे खैरात उजाले जरा से तुम
जुगनू से ना मिटेंगे अंधेरा घना हूँ मैं
गुम है सुकून चैन अमन शहर से मियां
आलम ये दहशतों का कहां सो रहा हूँ मैं
अंगड़ाई जुल्फ आईना ख्वाबों गुलाब चांद
अब मुफलिसी से टूट सभी को भुला हूँ मैं
सजदा इबादतें ये जियारत है राएगा
उलझी सी जिंदगी है ये उलझा हुआ हूँ मैं
नजरें ये भीग जाती है अखबार देखकर
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नजरे ये भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे भी अब तो आ रही बाजार देख कर
कोने मे घर के जो पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर
माटी के चुल्हे ने भी तो अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की ये सरकार देख कर
आंगन हरा भरा था वो बच्चो के शोर थे
खामोश सारे मौज हैं दीवार देख कर
रिश्ते संभाले हमने तो मोती के जैसे ही
सबने निभाया हमसे इश्तेहार देख कर
देखे बदलते लोग जमाने के साथ साथ
दिल भर गया है माँ का ये पुचकार देख कर
अपनी ही साख से बिछड़ा हुआ पत्ता हूँ मै
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अपनी ही साख से बिछडा हुआ पत्ता हूँ मै
दिल जरा पास तो आ खूब ही तन्हा हूँ मै
रोज ही ख्वाब को बेचा है जरुरत के लिए
वक्त से जूझता बेबस सा वो लम्हा हूँ मै
अपने मतलब की सभी बांट लेते आपस में
घर पे आता है जो अखबार का पन्ना हूँ मै
कल जो बुनियाद था घर का उसे भूले है सभी
राएगा फालतू सा अब कोई रिश्ता हूँ मै
शह्र में सबने तगाफूल है किया जिसको सदा
क्या सियासत का उछाला कोई मुद्दा हूँ मै
जैसे पैबंद लगा हो कोई मंहगा कपड़ा
यूँ समझता हूं मै खुद को कोई धोखा हूँ मै
जिंदगी खुब ही शिद्दत से तपी है साहब
कश्मकश मे ही जरा फिर भी तो उलझा हूँ मै
चुभती जह्न में है कहकहो की आवाजें
दायरों में ही बंधी सोच मे फिरता हूँ मै
Thursday, 5 September 2019
आंखों में लग के काजल फैला जरूर होगा
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आंखों में लग के काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा
उम्मीद हो वफा की चादर से कैसे साहब
हालात हर कदम पर रूसवा जरुर होगा
हम आज अजनबी से जो शहर में है तेरे
रिश्ता कोई दहर से अपना जरुर होगा
खुश्बू महक ये कैसे यूँ खोने अब लगी है
अपनो के दरमियां ही धोखा जरुर होगा
ये जिक्र फिक्र तेरा ख्वाबों खयाल तेरे
कुछ इसके भी सिवा तो चर्चा जरुर होगा
सिक्कों की कद्र ज्यादा रिश्तों से हो गई जब
अपनो ने तंग आकर छोडा जरुर होगा
है रक्त में नहा कर अखबार आज आया
कल हादसा कहीं पर गुजरा जरुर होगा
अखबार मे ही भुखा रोटी लपेट लाया
संसद पटल में कल ये मुद्दा जरुर होगा
Saturday, 31 August 2019
क्या खयाल उनको हमारा कभी आया होगा
क्या खयाल उनको हमारा कभी आया होगा
यूँ ही उनका भी कभी दिल गुनगुनाया होगा
उठ के वो बैठ गए होंगे कभी रातों में
देख ख्वाबों में हमे दिल मुस्कुराया होगा
मन तो तड़पा होगा मिलने को कभी हमसे भी
नाम लब पर भी हमारा कभी आया होगा
झुक जाती होंगी नजरें भी कभी शर्माकर
याद वो बैठ के हमको फरमाया होगा
हमपे गुस्सा तो कभी प्यार कभी तब्सिरा
तजकिरा उनको हमारा कभी भाया होगा
बैठ खिलवत में कभी हाल हमारा सोच के
वो जफाओं पे कभी तो पछताया होगा
जब सताया कभी यादों ने हमारी उनको
अश्क आंखों में ही फिर तो उतर आया होगा
Thursday, 1 August 2019
पाक दामन सारे किरदार ज्यूं ही हो जाए
पाक दामन सारे किरदार ज्यूं ही हो जाए
जन्नतों से बड़ी जन्नत ये जमीं हो जाए
पलकें नीची ही रखो हाथ जो देने को उठे
सामने वाला पशेमां न कहीं हो जाए
ऐसे इमदाद करो खुद को न मालूम चले
लेने वाले को खुदाई पे यकीं हो जाए
दिल दुखाने की न कोशिश भी कभी करना तुम
तेरी हरकत से न आंखों में नमीं हो जाए
गर ये दुनिया को बदलना है तो खुद को बदलो
क्या खबर यूँ ही बुराई में कमी हो जाए
आज शिद्दत से रगड़ कर है गुसल हमने किया
अब यकीनन ही जरा साफ जबीं हो जाए
सो रहा भुखे पड़ोसी क्या सरोकार तुझे
कोई खुदगर्ज़ न इतना भी कहीं हो जाए
वक्त ने हमको पढ़ा है बड़ी शिद्दत से मियां
हम मजम्मत की गवाही न कहीं हो जाए
अपने किरदार का कुछ भी तो पता रहने दे
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अपने किरदार का कुछ भी तो पता रहने दे
है जरा दाग जो दामन में लगा रहने दें
हसरतों और तकाजों की वही जिद हरदम
फलसफा है ये अजीब और हटा रहने दे
यूँ तमाशा है बहुत दिल का है उखडी सांसे
अब भी उम्मीद का जलता है दीया रहने दे
उलझने ही है बढ़ाते ये फकत रिश्ते सब
रह गया अब जो है बाकी ये जरा रहने दे
हम चले जाएंगे महफिल से तेरी यूँ उठकर
करके बेआबरू हमको न उठा रहने दे
टांग देता हूँ हर इक शाम बदन खूंटी पर
मेरी दहलीज का मत पुछ पता रहने दे
बांध दो मेरे खयालात हो जंजीरें अगर
आरजूओं को न यूँ आप खुला रहने दे
Saturday, 27 July 2019
रखे हैं शौक जरूरत जुदा जुदा करके
रखे हैं शौक जरूरत जुदा जुदा करके
खयाल ख्वाब तमन्ना सजा सजा करके
तमाम उम्र मुकम्मल नही जो हो पायी
पिघल रही है वो हसरत रुला रुला करके
गजब का यार मिला हमको राहे उल्फत में
सितम करे है सितमगर बता बता करके
वो कत्ल करने की देता है धमकियां मुझको
किया है इश्क भी उसने डरा डरा करके
वो भी शरीक था मेरे तमाशबीनों में
पुकारते हैं जिसे सब खुदा खुदा करके
कदम कदम पे है मौजूद वो मेरा मालिक
रखा है जिसको बशर ने जुदा जुदा करके
नजर मिजाज नजरिया कि तल्खियां देखूं
नजर मिजाज नजरिया कि तल्खियां देखूं
उलाहनों में मुहब्बत कहां कहां देखूं
सितमगरी में वो उस्ताद हैं जमाने में
कुछ ऐसे खबरों की मै रोज सुर्खियां देखूं
शरारतें हैं बहुत उनकी मुस्कुराहट में
लबों के जुम्बिशे इल्लत की शोखियां देखूं
वो हिचकियों में कहीं याद कर रहा शायद
खयाल ख्वाब में अब मै अना कहां देखूं
जरा सी आंच बची है जो दिल में रहने दो
दिली तमन्ना है हसरत धुंआ धुंआ देखूं
शरीक है वो मेरे जिस्म में महक बनकर
मै बेखबर हूँ उसे बस यहाँ वहाँ देखूं
Friday, 26 July 2019
मुद्दतें जिनको लगी दिल से भुलाने के लिए
मुद्दतें जिनको लगी दिल से भुलाने के लिए
फिर चली आयी वही याद सताने के लिए
वक्त के साथ जो धुंधला से गए थे लम्हें
सामने आंख के फिर आए रूलाने के लिए
हर कदम पर वो नये रब्त बना लेते हैं
हम तरसते है यहां दोस्त पुराने के लिए
रूठकर देखा है हमने भी कई बार मगर
कोई आया ही नही हमको मनाने के लिए
अपने कांधे पे वो लाश अपनी लिए फिरता है
मुस्कुराता है फकत सबको दिखाने के लिए
हर दफा और नया जोश मिला उठने का
मुश्किलें आयीं कई बार गिराने के लिए
कुछ नये ख्वाब सजा कर के बुझी आंखों में
जिंदगी यूँ भी मिली हमसे रिझाने के लिए
स्याह रातों को निचोड़ा है बड़ी शिद्दत से
अपनी बस्ती को नया शम्स दिखाने के लिए
यूँ ही चेहरे पे लकीरें नहीं बनती साहब
जीने पड़ते हैं तजुर्बे ये बनाने के लिए
आदमी है कि मदारी है समझना मुश्किल
खुद तमाशा वो बना सबको हंसाने के लिए
Tuesday, 9 July 2019
ये जिंदगी भी क्या है कहीं जिंदगी कोई
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ये जिन्दगी भी क्या है कहीं जिंदगी कोई
मिलती है यूं कि जैसे मिले अजनबी कोई
तय फासलों के साथ मिली हर खुशी हमे
लगने लगी है अब तो ये खैरात सी कोई
किरदार सब निभाए है संजीदगी के साथ
हमने किसी से की न कभी दिल्लगी कोई
औकात बख्श करके खुदा तौलता तुम्हें
मौका लपक ले कर ले जरा बेहतरी कोई
मजमा सा देखकर के जरा हम ठहर गए
नीलाम हो रहा था वहां आदमी कोई
छप्पर नही है आज भी हर आदमी के सर
राहत बंटी है खूब यहां कागजी कोई
किरदार आईने में नजर आते ही नही
कितनी सफाई कर ले यहां जिस्म की कोई
रोने की हमको कोई इजाजत नही मियां
चाहे हो जिंदगी में यहां बेबसी कोई
Sunday, 7 July 2019
तमाम दर्द को दिल में दबा के बैठ गए
तमाम दर्द को दिल में दबा के बैठ गए
सुकून वास्ते माजी भुला के बैठ गए
वो याद आते हैं अब तो बड़ी मशक्कत से
अतीत से तो बहुत धोखे खा के बैठ गए
मै आजकल तो सरेआम बिक रहा साहब
जमीर हूँ मै मुझे सब भुला के बैठ गए
ये बारिशों ने किया शहर तर ब तर ऐसे
जनाबे आली सभी मुंह छिपा के बैठ गए
ये बाहमी से मरासिम के फेर में साहब
क्यूँ गफलतों की बिमारी भुला के बैठ गए
न कर तू फिक्र हमारी हैं ठीक हम बेटा
मां बाप फोन पे हर गम छिपा के बैठ गए
बहुत उदास थे मीनार भी कंगूरे भी
फिर एक दूजे के वो पास आ के बैठ गए
गुजरते वक्त मुझे बार बार छेड़ें है
न पाए मन का तो फिर वो रूसा के बैठ गए
हमारे हद की खबर थी हमें भी अच्छे से
सो बात रोक वहीं चुप लगा के बैठ गए