तैश में यूँ घर जलाना छोड़ दो
जोश में बेवज्ह आना छोड़ दो
अक्ल से कुछ काम लो ओ साथियों
मुल्क को अब बरगलाना छोड़ दो
खुद के भी कुछ अक्ल कर लो खर्च तुम
कह रहा हैं क्या जमाना छोड़ दो
चल रही है साजिशें गंभीर ही
तुम यकीं से डगमगाना छोड़ दो
आयी है मुश्किल घड़ी फिर एक बार
मुंह छिपाकर भाग जाना छोड़ दो
आदमीयत की दुहाई है मियां
अब यहाँ मजहब बताना छोड़ दो
नाम से पहचान लेते हैं तुझे
जात के तमगे लगाना छोड़ दो
क्या करोगे यूँ असासा जोड़ कर
खाक है ये जर खजाना छोड़ दो
कब कोई पंछी चला आए यहाँ
छत पे भी दो चार दाना छोड़ दो
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