Wednesday, 4 December 2019

मुकद्दर की फकत बदमाशियाँ अच्छी नही लगती

मुकद्दर की  फकत  बदमाशियाँ  अच्छी  नही  लगती
ये हर पल  चश्मे तर  गुस्ताखियाँ  अच्छी नही लगती

खुशी का तजकिरा भी ख्वाब सा लगने लगा अब तो
हमे   हर वक्त  अब  मजबूरियाँ  अच्छी  नही  लगती

नदारद  है    मेरा  किरदार   ही    मेरी    कहानी   से
मुकद्दर  की   यही  गुस्ताखियाँ   अच्छी  नही  लगती

मुकर्रर है  फकत  दो गज  मेरी भी मिल्कियत साहब
सदा बस  मुफलिसी  की यारियाँ  अच्छी नही लगती

लबों  से   छिन  लो   इकबाल  के  कौमी  तराने  को
फसादी  दौर में    लफ्फाजियाँ   अच्छी  नही  लगती

कभी  उम्मीद से  अच्छा  जरा  वो  कर भी सकता है
अब इतनी  आजकल  अच्छाइयाँ अच्छी नही लगती

सियासत  के  पतीले  पर   फकत  जज्बात  पकते है
सिसकती   कांपती   लाचारियाँ  अच्छी  नही  लगती

रवैया  देख    बच्चों  के    हुआ  अहसास   बापू  को
कि बारीश थमने पर फिर छतरियाँ अच्छी नही लगती

गुजर  पाता  नही   इक  हादसा   दूजा   चला  आता
उसे    बेखौफ    मेरी  बच्चियाँ   अच्छी   नही लगती

बदन तो  धूप  चखता है  मगर  दिल प्यार का प्यासा
भरे  मन  ख्वाब  की  दुश्वारियाँ   अच्छी  नही  लगती

निकल पड़ता है अल सुब्ह ही सूरज अपनी ड्यूटी में
उसे   बे बात    लापरवाहियाँ     अच्छी   नही लगती

बदन और जेब पर कुछ  बोझ ही  बढ़ता है बेमतलब
बिचारे  मुफलिसों  को   सर्दियाँ  अच्छी  नही  लगती

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