मीर की गजलें सुनाना छोड़ दो
अब तरन्नूम और तराना छोड़ दो
तुलसी की चौपाई मीरा के भजन
काफिरी है गुनगुनाना छोड़ दो
दायरों में बंट गयी तहज़ीबे अब
यूँ करो अब दोस्ताना छोड़ दो
अम्न पर हावी सियासत फिर हुई
अब तो नफरत का बहाना छोड़ दो
रेशा रेशा गुंथ कर रख्खा जिसे
प्रेम का वो ताना बाना छोड़ दो
बात अब कि कौम पर आ ठहरी है
कौन अब अपना बेगाना छोड़ दो
मुल्क गर बर्बाद होता है तो हो
हम रहे बाकी जमाना छोड़ दो
तौर कोई ये समझदारी नही
बे वजह की जिद में आना छोड़ दो
आपका भी मुल्क है समझो यदि
तैश में जलना जलाना छोड़ दो
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