Thursday, 26 December 2019

मीर की गजलें सुनाना छोड़ दो

मीर की  गजलें   सुनाना  छोड़ दो
अब तरन्नूम  और   तराना छोड़ दो

तुलसी की  चौपाई  मीरा के भजन
काफिरी  है    गुनगुनाना   छोड़ दो

दायरों  में  बंट  गयी  तहज़ीबे अब
यूँ  करो   अब   दोस्ताना   छोड़ दो

अम्न पर  हावी  सियासत फिर हुई
अब तो नफरत का बहाना छोड़ दो

रेशा रेशा   गुंथ कर   रख्खा  जिसे 
प्रेम का  वो   ताना बाना   छोड़ दो

बात अब कि कौम पर आ ठहरी है
कौन अब  अपना बेगाना  छोड़ दो

मुल्क  गर  बर्बाद  होता  है  तो  हो
हम  रहे   बाकी   जमाना  छोड़ दो

तौर   कोई     ये  समझदारी    नही
बे वजह की जिद में आना छोड़ दो

आपका  भी  मुल्क है  समझो यदि
तैश  में  जलना  जलाना  छोड़  दो

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