2122 1212 22
अब इधर या उधर से खारिज है
जिंदगी ही बहर से खारिज है
यूँ तो लम्हें हैं बेशुमार जमा
पर ये खुशियां सिफर से खारिज है
है नदारद अब आदमीयत ही
हा मुहब्बत जिगर से खारिज है
ताक पर फित्नेबाज बैठे हैं
अब जहर भी जहर से खारिज है
आग पे आग भी नही मिलती
अब दहक भी असर से खारिज है
फूंक से ही सुलग रही दुनिया
ताप भी अब शरर से खारिज है
लोग मिलते हैं दिल नही मिलते
राहे दिल भी डगर से खारिज है
कुछ न अहसास अपनेपन का रहा
अब खुमारी नजर से खारिज है
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