फिरका वहशत है चार सू देखो
है फिजा में अजब सी बू देखो
हाथ मिलते हैं बाहमी लेकिन
आंख उतरे हुए लहू देखो
सारे चेहरे उदास दिखते हैं
हर मसाइब है हुबहू देखो
बरगलाए गये यकीनन है
यूँ नही बन गये अदू देखो
चार लम्हें सुकून के हो बस
मुख्तसर सी है आरजू देखो
पल दो पल की खबर नही लेकिन
सबको कल की है जुस्तजू देखो
आंच पर सब ही जिंदगी ठहरी
दांव पर सबकी आबरू देखो
कुछ लफंगे भी अब सियासत में
बन गये शह्र ए सुर्ख़ रू देखो
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