Sunday, 29 December 2019

बारहा कैसे ये किरदार बदल ले अपना

2122 1122 1122 22
बारहा   कैसे  ये   किरदार   बदल  ले  अपना
दिन बदलते की क्या दिलदार बदल ले अपना

जिंदगी   मौज  में   गुजरेगी   तेरी  भी  साहब
शर्त   ये है  कि तू   दरकार  बदल  ले  अपना

है  सितमगर  तो  अमादा  ही  सितम ढाने को
थक  गया  जो  भी  वो इंकार बदल ले अपना

बस  खसारा  ही खसारा  है  फकत उल्फत में
कोई  अगर  चाहे तो  व्यापार  बदल ले अपना

लांघ     दहलीज़  गयी    बेटी    परायी   कैसे
क्या  है  आसां  कोई  हकदार बदल ले अपना

रोज   इक  जैसी   खबर   झूठ   फरेबी   बातें
क्यूँ न  अब  लोग ये अखबार बदल ले अपना

अर्जियां   ले  के   भटकना   जो  पड़े  राहों में 
क्यूँ  न  जमहूर  वो  सरकार  बदल  ले अपना

गर  किसी  हाथ  दिखे  दाग जरा से भी अगर
चाहिए    ऐसे   मददगार   बदल   ले   अपना

हर इक लम्हें में बदल जाते हैं  मौसम ही जहाँ
लोग  मुमकिन है कि  त्यौहार बदल ले अपना

दहशते  दौर   छलावा  है   सियासत  है   सब
कोई  घबरा  के  न  घर बार  बदल  ले अपना

मुद्दई   लाख   बुरा   चाहे   तो   क्या  होता है
बिन  रज़ा  उसके  यूँ दरबार  बदल ले अपना

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