1212 1122 1212 22
वहीं है दिन है वहीं रात फिर नया क्या है
ये तारीखों के सिवा कुछ बदल हुआ क्या है
सहमते कांपते से लोग नजर आते है
उदासियों के सिवा कुछ कहीं दिखा क्या है
गुजर रहे हैं फकत दिन महीने साल यूँ ही
तुम्हारी याद है और कुछ फिर बचा क्या है
कुछ एक लम्हें ही हिस्से हमारे आए हैं
तेरी नराजगी से बढ़ कभी मिला क्या है
निकल पड़े हैं हर इक सुब्ह ढूंढने खुद को
हर एक शाम ही घर पुछता बता क्या है
बखूब चेहरे को पढ़ लेते बाबूजी मेरे
उदास देख के पुछ लेते थे हुआ क्या है
जो माँ ने हाथ धरा सर पे मुस्कुरा कर के
मै मुश्किलात गया भूल सब दुआ क्या है
No comments:
Post a Comment