Friday, 24 January 2020

आदमीयत शहर से खोने लगी है आजकल

आदमियत  शहर  से  खोने  लगी है आजकल 
इज्ज़तें   नीलाम   ही  होने   लगी है आजकल 

बिक रहे  इंसाफ भी  अब कौड़ियों के दाम पर 
देख  हालत   जिंदगी   रोने लगी है  आजकल

दफ्न  कर दी  ख्वाहिशें घर की खुशी के वास्ते
उनकी  रुसवाई  नजर  धोने लगी है आजकल

रब्त की  सौगात  जो  पाकर के हम  इतराते थे
उनकी  बोली   तीर चुभोने  लगी है  आजकल

बीज जो रोपा था  हमने  कल मुहब्बत के लिए 
नफरतें   नस्लें  नयी   बोने  लगी  है  आजकल

जिनके कांधो पे हिफाजत का रहा जिम्मा सदा
साजिशों में  वो शरिक होने  लगी है  आजकल

हर तरफ ही है मची कुछ अफरातफरी सी यहां 
और  हुकूमत  चैन से  सोने  लगी है  आजकल

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