Friday, 10 January 2020

कम्युनल हूँ डर लिखता हूँ

कम्युनल हूँ   डर   लिखता हूँ
उल्टा-सीधा   पर   लिखता हूँ

देखे  हैं       आडंबर       ढेरों
पत्थर को भी  हर  लिखता हूँ

कोठी  वालो  को   ईश्वर   अर
बेघर  को   बेघर   लिखता  हूँ 

रात को  रात ही  कहता हूँ  मैं
अख्तर को अख्तर लिखता हूँ

उन्मादी    फिरको   के   हत्थे
चढ़ते  बेबस   सर  लिखता हूँ

बद नियत  के   कारण  बहते
हर इक आंसू  पर  लिखता हूँ

जिसको तुम उत्सव कहते हो
उसको मैं  महशर  लिखता हूँ 

मुल्क मुहब्बत   तोड़ने   वाली
सोच को मै  जर्जर लिखता हूँ

तुम  पढ़ते हो  अपने  मन की
मै  भी तो  मन भर लिखता हूँ

झूठ  नही   लिख्खा  जाता है
सत्य का  हर स्तर  लिखता हूँ

मुल्क परस्ती   भी   है  मुझमें
दहशत गर्दी  बर   लिखता हूँ

भारत माता  की  जय  कहता
पहले देश अक्सर  लिखता हूँ

हर  मसले  पर  खूब लिखा है
हर हुक्काम  इतर  लिखता हूँ

खांचो  में  दिखती  है  दुनिया
इस पर या उस पर लिखता हूँ

गल्त कहे तो  कहता  रहे  वो
ऐसों को अब  मर  लिखता हूँ

दुनिया लिखती हैं जो लिख्खे
खुद को मै  बेहतर लिखता हूँ

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