कहीं के जुल्म कहीं के गुनाह भी आये
हवा के साथ भटकते कुछ आह भी आये
जमीन फाड़ के मुर्दे लगे निकलने जब
तबाह करने को फिर खैर ख्वाह भी आये
हरेक लफ्ज़ के मानी बदल बदल के मियां
कलम के शाह कलंदर इलाह भी आये
सुखनवरी की महक तोड़ सरहदें आयी
तो साथ साथ ही बादल सियाह भी आये
हरफ हरफ पे हुए तजकिरे हजार मगर
सवाल मौन ही रखने सलाह भी आये
जहन असीर जुबां इंकलाब के नारे
दो मुँहो वाले कुछ ऐसे गवाह भी आये
वतनपरस्ती का उनका अलग तरीका है
हम आये सजदे वो कोई और राह भी आये
सफ़ीने थाह लगा पाये ना समंदर की
बचा के जान अब अपनी मल्लाह भी आये
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