Thursday, 22 December 2016

आंसूओ के हिसाब कौन रखता है

आंसूओ के हिसाब कौन रखता है
हाथ  सुखे "गुलाब" कौन रखता हैं

होंगी  कुछ  तो  जरूर  मजबूरियां
वरना सर पे अजाब कौन रखता है

नहीं  फबती  है  हरदम  उदासियां
यूँ ही  चेहरे  नकाब कौन रखता है

ढुंढ लेती है  खुद  मुश्किले  हमको
चाह  करके  जनाब कौन रखता है

अपनी ख्वाहिश है धूप मुट्ठी भर ही
अपने घर आफताब कौन रखता है

बरसी है  बेहिसाब  ही  तसल्लियां
इतने  झुठे  हुबाब  कौन  रखता है

आरज़ू  शिकवे  उम्मीद  बेचैनियां
साथ इतने अहबाब कौन रखता है

मुस्कुराहट  तबस्सुम  ये  कहकशें
गम के है असबाब कौन रखता है

Wednesday, 21 December 2016

श्रद्धा विश्वास सबूरी है रोटी

श्रद्धा  विश्वास  सबूरी है रोटी
जिंदा  रहने   जरूरी  हैं रोटी

लफ्जों से  पेट  नही भरता है
टुटता   बदन  मजूरी  है रोटी

आदमी  यूँ ही  नही झुकता है
बेबसी    जी  हजूरी   है  रोटी

भुखे को चांद में भी दिखती है
शायर की  शाइरी  भी है  रोटी

टुटे  ख्वाबों को  पुरा  करती है
कितने  हसरत  अधुरी  है रोटी

उम्मीदें   पैदा   नयी   करती है
ख्वाहिशों की  तिजोरी  है रोटी

दास्तानों  की  नींव  में है  बसी
हर  कहानी  की  धुरी  है  रोटी

कहीं बरबाद  होती  दिखती है
कहीं  रोती  बिलखती  है रोटी

Tuesday, 20 December 2016

हादसा ये भी दरमियां गुजरा

हादसा  ये भी  दरमियां  गुजरा
कोई तुझसा  कहीं कहां  गुजरा

दिल को तेरी तलब ही ऐसी थी
आखिरी  हश्र   इब्तिदा  गुजरा

सुर्खियां बनती  बेबसी अब तो
फब्तियों  में ही  तब्सिरा गुजरा

मुश्किलों  में ही  जिंदगी गुजरी
इक गया  तो  ये  दुसरा  गुजरा

आरज़ू   जिनसे   रहनुमाई  थी
वो  मेरा   वक्त   बेजुबां  गुजरा

हौसले   ओढते    बिछाते  हुए
सर्दियों का  जो दौर था  गुजरा

आस बन के ही रह गई दुनिया
दौर  अच्छा  भी  राएगा गुजरा

हसरतें  शामियाना   ढुंढती  है
चाह  अक्सर ही  बेरिदा गुजरा

मुक्तक दायरों में सिमट के मिलती है

दायरों  में  सिमट  के  मिलती है
जिंदगी  हमसे छट के मिलती है

रहती  है  दूर  दूर    खुशियाँ  तो
मुश्किले  ही लिपट के मिलती है

मुक्तक कतरा कतरा निचोड़ा जाता है

कतरा कतरा निचोड़ा जाता है
रात तब  सुब्ह बन के आता है

बुंदो  बुंदो  में  चांद  पिघला है
सुब्ह  सुरज  वो कहा जाता है

मुक्तक सुबह आयी जरा जरा करके

सुब्ह  आई  जरा  जरा करके
रात  गुजरी  है  थरथरा करके

धूप  लरजाई  हुई  दिखती  है
चांद पिघला है तब्सिरा करके

मुक्तक हादसा ये भी दरमियां गुजरा

हादसा  ये भी  दरमियां  गुजरा
कोई तुझसा  कहीं कहां  गुजरा

दिल को तेरी तलब ही ऐसी थी
आखिरी  हश्र   इब्तिदा  गुजरा

Monday, 19 December 2016

रात बाकी है आसमाँ बाकी

रात  बाकी  है  आसमाँ  बाकी
दर्द  जाने   कहाँ   कहाँ  बाकी

कतरा कतरा पिघल गया सारा
चांद का है तो बस निशां बाकी

शोर सुन्ते थे जिन्की गलियों में
रह गई उनकी बस जुबां बाकी

जो कभी आशना थे महरम थे
अब  कही है  कोई कहां बाकी

लोग  मिलते  हैं  दायरो  में  ही
रह गया कुछ न दरमियां बाकी

ना कहीं अपना यार मिलता है
ना ही अपना कोई मकां बाकी

अब ना राहत सुकून बिकते हैं
ना  कहीं है  कोई  दुकां  बाकी

Sunday, 18 December 2016

इक उम्र के बाद हाल नही पुछा जाता

इक उम्र के बाद हाल नही पुछा जाता
भंगारो पे  यूँ  सवाल  नही पुछा जाता

उधड ही जाती है परतें पुरानी होने पे
दीवारों से ये  मलाल नही पुछा जाता

गुजरे है उनकी रातें  नर्म लिहाफों में
शह्र कौन है बे हाल  नही पुछा जाता

हर रुप में  बरसे महशर दर्द है इतना
अब  सुकून ए हाल  नही पुछा जाता

आरजू है  खुशरु  ख्वाहिशों की यहां
जरुरते जब्र कमाल  नही पुछा जाता

Sunday, 11 December 2016

रुठते नही है अब कि मनायेगा कौन

रुठते नही है अब कि मनायेगा कौन
पुछने उदासी के सबब आयेगा कौन

बांध रखा है  घर से  रुहानी रिश्तों ने
वरना दीवारों से मिलने जायेगा कौन

बैठा  है  दर्द  पहलू  में  जैसे  यार  है
इतना करीबी रिश्ता  निभायेगा कौन

करते नही नुमाइश अपने जख्मों की
मरहम  रिसते जख्म  लगायेगा कौन

है  रात कोई  और  इस रात  के आगे
चांद से जाकर अब ये बतायेगा कौन

जब लगा  जिंदगी  पढ लिया है तुम्हें
खुद पे हंसी आयी आजमायेगा कौन

कतर दिये हैं "पर" हमने ख्वाहिशों के
"बेपर" परिंदों को अब उडायेगा कौन

Friday, 9 December 2016

जिंदगी तुने आजमाया देर तक

जिंदगी  तुने आजमाया  देर तक
सोंच ये दिल  मुस्कुराया  देर तक

ख्वाब थे शीशे के सब पिघल गये
आंच ने दिल को जलाया देर तक

मुख्तलिफ  सी  हवा के  दरमियां
इक  दीया  टिमटिमाया  देर  तक

हौसलो  के  आखिरी  मुकाम पर
वो  परिंदा  फड़फड़ाया  देर  तक

दिल को बहलाने गये थे बज्म में
तेरी महफिल ने  रुलाया देर तक

चाहतें  थी  चांद  छूने  की  मगर
जरुरतों ने  हमे  भगाया  देर तक

गुनगुनाता  जा  रहा  था   फकीर 
धूप  रहता है  ना  साया  देर तक

Thursday, 1 December 2016

सोचता हूँ नकाब रख लुं क्या

सोचता  हूँ  नकाब  रख  लुं क्या
साथ  अपने   सराब रख लुं क्या

लोग   खंजर  लिए   है  हाथों में
हाथ  मै  भी  गुलाब रख लूं क्या

आजमाना  है   सारे   रिश्तों  को
आज सबका हिसाब रख लूं क्या

खुब  चर्चे  हैं   खामोशी  के मेरी
होंठ  पर ही  जवाब रख लूं क्या

तिरगी   फैली  है  शहर  में  क्यों
पहलू  में आफताब  रख लूं क्या

कुछ अहसासे मुफलिसी हो कम
नाम  अपना  नवाब रख  लूं क्या

कुछ  औकात  का पता  तो  चले
आंख में  हंसी ख्वाब रख लूं क्या

क्यूँ   खुशियाँ  हुई  बेघर  अक्सर
शिकवों  की  किताब रख लूं क्या

ख्वाहिशों  की  यतीम  कहानी में
दर्द  भी  लाजवाब  रख  लूं  क्या

Tuesday, 22 November 2016

आयी है सुब्ह फिर नई खबर लेकर

आयी है सुब्ह फिर नई खबर लेकर
फिरते हैं लोग हाथों में पत्थर लेकर

फिजाओं में अजब सी गंध फैली है
बैठे हैं कुछ लोग  जुबां जहर लेकर

इक दीये ने अंधेरों से बगावत की है
देखें फैलेगी  कहां तक असर लेकर

तमाशे रोज नये नये है  शहर में मेरे
रोज आते हैं मदारी नये हुनर लेकर

हौसला ये की जमाने से लड़ जायेगें
जो मिले तो  सहमा सा जिगर लेकर

साजिशों पर भारी  पड़ रही है नेमते
सुब्ह निकलता हूँ संग मैं मेहर लेकर

नये दौर  नये तौर नये  चलन में अब
दोस्त भी मिले पहलू में खंजर लेकर

रह गये महज मकां ईंट और गारो के
गये अजीज अपना अपना घर लेकर

लम्हा लम्हा सलीके से सहेज रखा है
बैठे हैं उन्ही यादों का  खंडहर लेकर

Sunday, 20 November 2016

रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर

रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर
जिंदगी जब मिली  तय फासला रख कर

नही दिखी कहीं खुलूस ऐ वफा की सूरत
भुल  गया है  खुदा   जाने   कहां रखकर

सुना है मुल्क में हवाओं का रुख बदला है
चलिए देखते हैं मुंडेर पे इक दीया रखकर

तमाम  उम्र ही  उनकी  दहकते  गुजर गई
चला  करते थे  जो हाथों में  धुंआ रखकर

पलक झपकते सब मालोजर खाक हो गए
हासिल न हुआ कुछ भी "असासा" रखकर

परतें ही उधड़ती दिखी है महज रिश्तों की
क्या मिला है और  दीवारें दरमियां रखकर

"दोस्त" सारे   ही  मुंह  फेरने  लगे  अब तो
अपनो को दूर किया हकीकी जुबां रखकर

Wednesday, 9 November 2016

कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा

कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा
जाने  कब   भूखों  के  मुंह  निवाला  जायेगा

इमारतों के पीछे छिप  झाँकता रहता है सुरज
जाने कब मुफलिस बस्ती में  उजाला जायेगा

अभी है चंद लोग यहाँ  जो जिंदा है जमीर से
कब तक भला  ये भरम  यूँ ही  पाला जायेगा

नही पुछता भुखा  कभी भी  मजहब रोटी का
वो मस्जिद हो आयेगा  फिर शिवाला जायेगा

ठिठुरता रहा  इक बेचारा  झोपडी में रात भर
उसके पडोस से आज चढ़ावे दुशाला जायेगा

बिफरते हैं हर शाम बच्चे देख शहर में रोशनी
उलझे है कैसे दिन ढले  उन्हें संभाला जायेगा

शाम हुई घर को चले है जेब फिर से खाली है
उम्मीदों को फिर नये  झांसे में  डाला जाएगा

तसल्ली नही देते अब झुठी उम्मीदो के कतरे
जिंदा रहने अब नया तरीका निकाला जाएगाः

Sunday, 6 November 2016

कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है

कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है
रिश्तों के निबाहों में    तल्खियां दबी सी है

गुजरते हुए हयात के   तजुर्बे रोज नये नये
वक्त के चंद लम्हो में  नादानियां दबी सी है

दिलों के बाहर तो बहुत शोर सुनाई देता है
दिलों के  भीतर में  खामोशियां  दबी सी है

बदचलन आवारा नींदे भटकती है रात भर
दर पर खड़े ख्वाबों में बेचैनियां दबी सी है

तहज़ीब के लिबास ओढ़े फिरे हैं यहाँ वहाँ
आज भी किरदार में  नादानियां दबी सी है

दे दे कर जख्म  पुछते है कि  हाल कैसा है
उनके  हर सवाल पर  फब्तियां  दबी सी है

दिली गुबार झाड़के शिकवे भंगार में देने है
एक इतवार में कित्ती मजबूरियां दबी सी है

वक्त की पोटली में कुछ लम्हें छुपाये रखे हैं
हर लम्हों में  कितनी  दुश्वारियां  दबी सी है

Friday, 4 November 2016

दर बदल जाते हैं दीवार बदल जाते हैं

दर बदल जाते हैं  दीवार बदल जाते हैं 
देखते  ही देखते  बाजार  बदल जाते हैं

सारा ही शहर ये अजनबी सा दिखता है 
हल्के वजूद देख पैरोकार बदल जाते हैं

सच के तिजारत मे अब बरकत नही है 
घाटा होने देख  कारोबार  बदल जाते हैं

घर के आंगन बुढा सा पेड दोस्त है मेरा 
मिला सुकून उससे जो यार बदल जाते हैं

पिता से भी मिलती है तो पति से पुछकर 
बिदाई बाद बेटी के हकदार बदल जाते हैं

थाल सजाए बैठी ही रह जाती है बहना
बाट जोहते भाई के त्योहार बदल जाते हैं

तुम्हारे शहर मेरे भी कुछ रिश्ते बसते थे 
हालात के साथ ही किरदार बदल जाते हैं  

मौला दे माफी ये बच्चे जरा भुलक्कड़ है 
घर गृहस्थी मे इनके संस्कार बदल जाते हैं

Wednesday, 2 November 2016

ख्वाब देखूंगा तो अखबार मे आ जायेगा

ख्वाब देखूंगा तो अखबार मे आ जायेगा
कुछ हकीकत  सरेबाजार मे  आ जायेगा

मै सांसे भी लेता हूँ  तो जमाने से छिपके
वरना कल वो भी इश्तेहार में आ जायेगा

मै मुफलिस इक मुद्दा हूँ सियासत के लिए
मेरे ये  हालात भी  दरकार में  आ जायेगा

मेरे हर निवाले पर भी  नजर रखी जायेगी
मेरा  किरदार भी  सरोकार में  आ जायेगा

बेबसी की  तस्वीरें मेरी  बिकेगी बाजारों में
ये मेरा  जिस्म भी  कारोबार में आ जायेगा

मेरे कांधो पे  चढ़ करके  शहर का  "लुच्चा"
कल को देख लेना  सरकार में  आ जायेगा

मत कर  गुस्ताखी   ऐ सुखनवर  तू रहने दे
वरना तेरा नाम भी गुनहगार में आ जायेगा

अभी जो बाकी है वजूद जरा जुदा सा तेरा
तू भी इस शहर के रिश्तेदार में आ जायेगा

Friday, 30 September 2016

खुद को उम्र भर अख़बार किया है हमने

खुद को उम्र भर अख़बार किया है हमने
अपने वजूद का  इश्तेहार किया है हमने

धूप छांव के खेल खेलती रही है जिंदगी
खुशी बेचने का  कारोबार किया है हमने

सिसकती मिली उम्मीदें हसरतें ख्वाहिशें
कुछ यूँ अपने को  लाचार किया है हमने

टपकते है आंसू  टूटे फुटे  उन छप्परों से
रिश्तों को टूटने से  इंकार  किया है हमने

चार दीवारें है घर में दरकती सीलन भरी
हिफाजते खुद को दीवार किया है हमने

ये और बात है कि हम समझ नही  पाये
देर तक जिंदगी का दीदार किया है हमने

पुराने जख्मों के टांके  फिर  खुल गये हैं
दर्द सहने खुद को  तैयार किया है हमने

बेलुफ्त बेसबब तू  गुजर रही थी जिंदगी
तेरे हक में अहम किरदार किया है हमने

Thursday, 22 September 2016

हमको जीने का तरीका क्यूँ नहीं मिलता

हमको जीने का तरीका  क्यूँ नहीं मिलता
गिरके फिर उठे ये मौका क्यूँ नहीं मिलता

राहत सुकून तसल्लियां भी तो मिले कभी
कुछ दर्द अश्क के सिवा क्यूँ नहीं मिलता

आदमी जो भी मिला  गमों से था लबरेज
कोई भी मुस्कुराता हुआ क्यूँ नहीं मिलता

उसूलों इमां की कीमत पे बसर है जिंदगी
जमीर कहीं जागा हुआ  क्यूँ नहीं मिलता

बे लुफ्त, बे सबब,  बे-इरादा  भी बेशुमार
मुझमें कुछ मुकम्मल सा क्यूँ नहीं मिलता

तमाम गिरहें खुलती जाती है हर सांस पर
मुझमे कोई नया तमाशा क्यूँ नहीं मिलता

मुकद्दर  चांद का  बिल्कुल  अपने जैसा है
तन्हा सा है फिर भी वो तन्हा नही मिलता

अरमानों के जलने की बू आती ही रहती है
सुलगती है सांसे   धुंआ  क्यूँ  नहीं मिलता

Sunday, 21 August 2016

नजरे भीग जाती है अखबार देखकर

·
नजरे भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे आ रही है अब बाजार देख कर

घर के कोने मे पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर

माटी के चुल्हे ने अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की सरकार देख कर

हरा भरा आंगन वो बच्चो का शोर
सारा आलम खामोश है दीवार देख कर

मैंने रिश्ते संभाले मोतियों की तरह
उन्होंने प्यार निभाया इश्तेहार देख कर

सब बदल जाते हैं जमाने के साथ
दिल भर आता है माँ का दुलार देख कर

Tuesday, 16 August 2016

भुख

दोपहर के समय
चिलचिलाती धूप में

चिथडे पहने नंगे पाँव घुमती
नन्ही सी जान भुख से बिलखती

पेट की आग के लिए
कई दुख सहकर भी

कई कई दिन भुखी रहती है

इस उम्र में वो
जिंदगी से मिल चुकी है

भुख के साथ
पुरी तरह हिल चुकी है

विवश है अपना भविष्य
तिमिरमय बनाने को

वह आदी हो चुकी है
इस तरह जिंदगी बिताने को

उसे भी है हसरत
खेलने की पढने की

पर उसे दी गई है शिक्षा
जिंदगी से लड़ने की

वह लड रही है
और अविरल लडती रहेगी

न लड़ाई खत्म होगी
न भुख खत्म होगी

एक दिन वह स्वयं ही
खत्म हो जायेगी

लडते हुए जिंदगी से
चिरनिंद्रा में सो जायेगी

बेकस इंसान

एक बेकस इंसान

समाज का जो अंग है
समाज से विभंग है

समाज से वो दूर है
बेबसी से मजबूर है

चाहता है वो भी
सामाजिक बनना

पर बन नही पाता है

इस पूंजी वादी समाज में
खुद को विवश पाता है

उसने जब भी कोशिश की
खुद को बदलने की

अपनी पुरी काया के साथ
सामाजिक ढांचे में ढलने की

अपने घर का आयतन उसे
छोटा ही लगा

एक अनजाने भय से
वो डरा रहा

परिवार को भुख सहना होगा
बेघर हो कर
रहना होगा

तब वो
सामाजिक बन पायेगा

समाज के साथ
कदम मिलाकर
चल पायेगा

उसने महसूस किया है कि
समाज उसके लिए
नही है

समाज हमेशा
पूंजीपतियों का रहा है

गरीब सामाजिक बन कर
सैकड़ों दुख सहा है

उसने उसी समय
सामाजिक बनने का
विचार त्याग दिया

जब आने वाले
अनजाने भय को
उसने याद किया

Monday, 15 August 2016

आजादी

आजादी

चंद सिरफिरे ही थे
जो लेकर आये थे उसे

फिर उनसे हाथ छुड़ा
जाने कहां खिसक गई

अब सुनते हैं कि
ठहरी है
रसूखदारो के यहाँ

जो आ रही थी
मुल्क में
रास्ता भटक गई

बरसों पहले

बरसों पहले
बंटी थी मरकज से

गणतंत्र के नाम पर
कोई आजादी
जैसी चीज

चंद गिने-चुने
रसूखदारो के बीच

ये सिलसिला
फिर यूँ ही
साल दर साल
चलता रहा

झोपडी का वो
स्वराज
डरा सहमा सा
कोठियों में
पलता रहा

आज भी
यही हो रहा है

उस डरी सहमी सी
आजादी के लिए
मुल्क
रो रहा है

Saturday, 6 August 2016

कहीं गम कहीं पे सुकून है

4कहीं गम कहीं पे सुकून है
बारिश का अपना जुनून है

कहीं भिगते है झोपडे
कहीं मस्ती के मजमून है

कहीं दरिया बहती आंखों से
कहीं ख्वाबों में रंगून है

इस शहर में मुर्दे बसते है
मुआफी यहां हर खून है

अल्फाजो को जरा तरासिये
यूँ चुभते ज्यों नाखून है

अदालतों को बदल निजाम
अंधे बहरों का कानून है

कहीं फैशन में है चिथडे फटे
कहीं बेबस फटी पतलून है

कहीं नाली में फैके अनाज है
कहीं भुखे से मजलूम है

दौर ए तरक्की कहते इसे
हर शख्स अपने ही धुन है

Thursday, 4 August 2016

मंजर ही हादसों का अजीबोगरीब था

मन्जर  ही  हादसे  का  अजीबो गरीब  था
निकला उदू भी वो ही जो सबसे करीब था

सौदा  न हो सका  कभी हमसे ये इश्क का
मंहगी थी उल्फतें ये दिल अपना गरीब था

मजबूरियों  बेचैनियों   का   नाम   जिंदगी
खामोश सा निबाह भी  कितना अजीब था

जीस्त  सस्ती है  साहब  मंहगी है ख्वाहिशें
खाली  जेबें  अक्सर   ही   मेरा  नसीब था

ढुंढा  नही मिला कहीं  हमको  वो  आदमी
खोया  हुआ  है  जात  में  मेरा  हबीब  था

गुंगा  पुकारता   है  बहरों  को   यहां  देखो
दिखा  हमे  सभी  सर  लटका  सलीब  था

मिजाजे यार ने हैरत में डाल रखा है

मिजाजे   यार  ने  हैरत  में   डाल  रखा है
रकीबो  से   ये  जो  रिश्ता  कमाल रखा है

सुब्ह से शाम तलक ख्वाहिशों को पाला है
ए ज़िन्दगी   तुझे    ऐसे    संभाल  रखा  है

देखा है वक्त ने मुझको  यूं चलते चलते ही
उम्मीद  सा   न दिखा   तो  मलाल रखा है

खयाल  ख्वाब से  आ  या  दरीचे दरवाजे
तेरे   लिए   कई   रस्ता    निकाल  रखा है

जरुरतों   ने   किया  है   हमें   हैरां  इतना
तमाम  ख्वाहिशें  कल को ही टाल रखा है

मेयार  भी  न  गिरा  मुल्क  का   यूं चौराहे
यतीम  क्यूँ  है   रिआया    सवाल  रखा है

खुशी  इत्मिनान  नींदे   मुश्किल  है  सभी
नसीब  कैसे   हो  हैरत   में   डाल  रखा है

Saturday, 30 July 2016

पेट भरे हो तो ही ये मजहब नजर आते हैं

पेट भरे हो तो ही ये मजहब नजर आते हैं
भुखे को मंदिर मस्जिद कब नजर आते हैं

जिंदगी में भुख ये कितने तमाशे करती है
चौराहे नौनिहाल के करतब नजर आते हैं

मुफलिस झोपड़ी में खिड़कियाँ नही होती
सुराखों के दरमियां ही  सब नजर आते हैं

टखने छाती से चिपका सो जाता है बेचारा
मांस नही जिस्म में हाड अब नजर आते हैं

आंसू उबालती है मां फिर खाली पतीले में
बच्चे भुख से बिलखते  जब नजर आते हैं

हुकूमतें अक्सर ही  वादे खिलाती आयी है
खोखले वादों में भुखे साहब नजर आते है

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा
नही मिलती कोई खबर वारदात के सिवा

मशरुफियत सी दिखी  हर शख्स में यहां
मिलता है गर्मजोशी से  जज्बात के सिवा

उठाकर जो देखी तस्वीरें  बीते सालों की
ठहरा हुआ वक्त मिला  लमहात के सिवा

आजमाईश हौसलों की करती है जिंदगी
वजूद रह गया  फकत  औकात के सिवा

कहकहों में कितनी सिसकियाँ दबी सी है
शोर बहुत है शहर में   सवालात के सिवा

तेरा ख्याल तेरी ही तलब  तेरी ही आरजू
सब मिला तेरे इश्क में मुलाकात के सिवा

रंग हुस्न गहने जलवे सब थे महफिल में
कमी न थी कोई वहां  हंसी रात के सिवा

देखे है शहर के भीतर बेशुमार है आदमी
वहां कोई भी तन्हा न था   जात के सिवा

दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा

दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा
नही मिला सुकून कहीं उसके दर के सिवा

खानाबदोश जिंदगी  राहों पे  हो रही बसर
हुआ क्या  हासिले हयात  सफर  के सिवा

कल रात दफ्फतन ही हमे वो बेरिदा मिला
दीद मुकम्मल न हुई पर भी नजर के सिवा

रुकी-रुकी सी लग रही नब्ज-ए-हयात क्यूँ
ये कौन उठा  सिरहाने से  बिस्तर के सिवा

जुस्तजू में जिसकी रहे  दर बदर  ताहयात
कहीं भी  न मिला  हमे वो  जिगर के सिवा

भुख की कीमत जो जिस्म बेचकर आयी है
कुछ भी उसमें बाकी कहां  पत्थर के सिवा

दीवानावार है जिंदगी  फिरती है यहाँ वहाँ
अजिय्यत मसाइल दर्द सब है घर के सिवा

Thursday, 28 July 2016

जब मिले बस वही बेकार की बातें

जब मिले बस वही बेकार की बाते
बेसबब बेफिजूल तकरार की बाते

अब नही होती चर्चा अम्न चैन की
अरसे से  सुनी नही  प्यार की बाते

फिजायें भी बेरंग सी लगने लगी हैं
अब नही होती है गुलजार की बाते

उस बस्ती मे चुल्हे अवकाश पर है
कैसे हो वहां कोई त्योहार की बाते

फुटपाथ पे यूँही बसर होती है अब
सुनते थे हम कभी घरबार की बाते

बदलती है शख्सियतें सुब्ह शाम में
कैसे करे कोई भी किरदार की बाते

हुकुमतें  तो फकत वादे खिलाती है
खोखली है सभी   सरकार की बाते

रसुखदारो की महज चलती है यहां
सुनी नही जाती है  लाचार की बाते

रवायतें उम्र भर यूँ भी निभाना पड़ता है

रवायतें  उम्र भर  यूँ  भी निभाना  पड़ता है
हादसों को भी अक्सर भुल जाना पड़ता है

हंसी सब  छिन ली है  वक्त की  खरासो ने
दबाकर सिसकियों को मुस्कुराना पडता है

नवाबी  भूली बिसरी  बातें बन कर रह गई
पेट की खातिर ये  जिस्म गलाना पड़ता है

कितने अरमानों को  सीने में छुपा  रखे थे
जरुरतों की खातिर उन्हें भुलाना पड़ता है

जुस्तजू में तेरी   दर बदर   खुद को किया
तेरे घर होकर ही मेरा आशियाना पड़ता है

टूटी सी पगडंडी देख चंद यादें हरी हो गई
यूँ ही पगडंडी से मेरा गांव पुराना पड़ता है

मसाइल जीस्त में बेवक्त ही आती रहती है
भुला सब मुश्किलें खिलखिलाना पड़ता है

वो बेबाकी से मुस्कुरा लेता है बच्चा है न

वो बेबाकी से मुस्कुरा लेता है बच्चा है न
किसी कांधे सर टिका लेता है बच्चा है न

नही रखता कोई हादसा  दिल में वो दबा
आसानी से दर्द  भुला लेता है बच्चा है न

कोई खरास कोई तल्खी वो जानता नही
सभी को अपना बना लेता है बच्चा है न

हंसता है रोता भी है बेवक्त में सोता भी है
वो वक्त से  लम्हे चुरा लेता है बच्चा है न

खुद से खेलता है खुद को ही खिलाता है
दिल को यूँ भी बहला लेता है बच्चा है न

आशनाई है किधर  भांप लेता है अक्सर
रिश्ते पल में आजमा लेता है  बच्चा है

Wednesday, 27 July 2016

सारी शिकायतें ले आ हिसाब जोड़ के

सारी शिकायतें ले आ   हिसाब जोड़ के
अपने सितम भी तो ला जनाब जोड़ के

भुले बिसरे सारे लम्हो को ला बटोर कर
सारे मसाइल रख फिर तू सराब जोड़ के

शफक बारिश बादलों से भी पुरी न हुई
बनी मुकम्मल धनक आफताब जोड़ के

हर सूं है बेतरतीब बिखरे से तेरे खयाल
रखा है  इक टूटा हुआ महताब जोड़ के

आने नही देती आंखे  इनको सारी रात
नींदे बैठी दहलीज  चंद ख्वाब जोड़ के

उस  टूटे  झोपड़े में  बरसा  है  झुम  के
भेजा ये कैसा मेरे खुदा सिहाब जोड़ के

मसला  नही है  कहीं भी  दैरो हरम  का
सियासत ने  रखा है ये  हुबाब  जोड़ के

Tuesday, 26 July 2016

दर्द की गलियों से होकर आना अच्छा लगता है

दर्द की गलियों से होकर आना अच्छा लगता है
कभी कभी  आंसू भी  बहाना  अच्छा लगता है

बिना दर्द के ये जिंदगी भी बेवजह सी लगती है
बिला वजह भी खुद को सताना अच्छा लगता है

जुबान जो फिसले तो  किरदार नंगे हो जाते हैं
तहज़ीब के ओढो ताना बाना   अच्छा लगता है

करवटों के बीच में तडफती रहती है सारी रात
किसी वजह कभी नींद न आना अच्छा लगता है

खैरातों के दिन है अपने और उधार की है रातें
मुश्किलों का बड़ा सा शामियाना अच्छा लगता है

धुल पैरों से जिस तरह लिपट चिपट सी जाती है
खयालो का तेरे यूँ   कभी आना अच्छा लगता है

अक्सर अपनी ही खुशियां क्यूँ बेघर हो जाती है
तकदीर को क्यूँ  हमे ही सताना अच्छा लगता है

बखूब है वाफिक वो जज्बात से मेरे

बखूब है वाफिक वो   जज्बात से मेरे
रहता डरा डरा सा है सवालात से मेरे

मसाइल जीस्त में तो है कोई कम नही
देता है औ जियादा वो औकात से मेरे

गिर के  वक्त से  कहीं  लम्हा  खो गया
हादसा ये जुदा नही  मुश्किलात से मेरे

इक खयाल एक तलब एक ही आरजू
वाक़िफ़ है ये शहर भी मामलात से मेरे

कोई शिकवा कोई गम कोई गिला नही
आशना है खुब ये आंसू भी जात से मेरे

मुआफिक मेरे एक दिन जी के देख ले
हो रुबरु  कभी तो तू भी हालात से मेरे

किरदार  यूँ हर घडी  बदला न किजिये
बची न शख्सियत तेरी निशानात से मेरे