4कहीं गम कहीं पे सुकून है
बारिश का अपना जुनून है
कहीं भिगते है झोपडे
कहीं मस्ती के मजमून है
कहीं दरिया बहती आंखों से
कहीं ख्वाबों में रंगून है
इस शहर में मुर्दे बसते है
मुआफी यहां हर खून है
अल्फाजो को जरा तरासिये
यूँ चुभते ज्यों नाखून है
अदालतों को बदल निजाम
अंधे बहरों का कानून है
कहीं फैशन में है चिथडे फटे
कहीं बेबस फटी पतलून है
कहीं नाली में फैके अनाज है
कहीं भुखे से मजलूम है
दौर ए तरक्की कहते इसे
हर शख्स अपने ही धुन है
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