Saturday, 6 August 2016

कहीं गम कहीं पे सुकून है

4कहीं गम कहीं पे सुकून है
बारिश का अपना जुनून है

कहीं भिगते है झोपडे
कहीं मस्ती के मजमून है

कहीं दरिया बहती आंखों से
कहीं ख्वाबों में रंगून है

इस शहर में मुर्दे बसते है
मुआफी यहां हर खून है

अल्फाजो को जरा तरासिये
यूँ चुभते ज्यों नाखून है

अदालतों को बदल निजाम
अंधे बहरों का कानून है

कहीं फैशन में है चिथडे फटे
कहीं बेबस फटी पतलून है

कहीं नाली में फैके अनाज है
कहीं भुखे से मजलूम है

दौर ए तरक्की कहते इसे
हर शख्स अपने ही धुन है

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