सोचता हूँ नकाब रख लुं क्या
साथ अपने सराब रख लुं क्या
लोग खंजर लिए है हाथों में
हाथ मै भी गुलाब रख लूं क्या
आजमाना है सारे रिश्तों को
आज सबका हिसाब रख लूं क्या
खुब चर्चे हैं खामोशी के मेरी
होंठ पर ही जवाब रख लूं क्या
तिरगी फैली है शहर में क्यों
पहलू में आफताब रख लूं क्या
कुछ अहसासे मुफलिसी हो कम
नाम अपना नवाब रख लूं क्या
कुछ औकात का पता तो चले
आंख में हंसी ख्वाब रख लूं क्या
क्यूँ खुशियाँ हुई बेघर अक्सर
शिकवों की किताब रख लूं क्या
ख्वाहिशों की यतीम कहानी में
दर्द भी लाजवाब रख लूं क्या
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