श्रद्धा विश्वास सबूरी है रोटी
जिंदा रहने जरूरी हैं रोटी
लफ्जों से पेट नही भरता है
टुटता बदन मजूरी है रोटी
आदमी यूँ ही नही झुकता है
बेबसी जी हजूरी है रोटी
भुखे को चांद में भी दिखती है
शायर की शाइरी भी है रोटी
टुटे ख्वाबों को पुरा करती है
कितने हसरत अधुरी है रोटी
उम्मीदें पैदा नयी करती है
ख्वाहिशों की तिजोरी है रोटी
दास्तानों की नींव में है बसी
हर कहानी की धुरी है रोटी
कहीं बरबाद होती दिखती है
कहीं रोती बिलखती है रोटी
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