रात बाकी है आसमाँ बाकी
दर्द जाने कहाँ कहाँ बाकी
कतरा कतरा पिघल गया सारा
चांद का है तो बस निशां बाकी
शोर सुन्ते थे जिन्की गलियों में
रह गई उनकी बस जुबां बाकी
जो कभी आशना थे महरम थे
अब कही है कोई कहां बाकी
लोग मिलते हैं दायरो में ही
रह गया कुछ न दरमियां बाकी
ना कहीं अपना यार मिलता है
ना ही अपना कोई मकां बाकी
अब ना राहत सुकून बिकते हैं
ना कहीं है कोई दुकां बाकी
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