Sunday, 20 November 2016

रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर

रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर
जिंदगी जब मिली  तय फासला रख कर

नही दिखी कहीं खुलूस ऐ वफा की सूरत
भुल  गया है  खुदा   जाने   कहां रखकर

सुना है मुल्क में हवाओं का रुख बदला है
चलिए देखते हैं मुंडेर पे इक दीया रखकर

तमाम  उम्र ही  उनकी  दहकते  गुजर गई
चला  करते थे  जो हाथों में  धुंआ रखकर

पलक झपकते सब मालोजर खाक हो गए
हासिल न हुआ कुछ भी "असासा" रखकर

परतें ही उधड़ती दिखी है महज रिश्तों की
क्या मिला है और  दीवारें दरमियां रखकर

"दोस्त" सारे   ही  मुंह  फेरने  लगे  अब तो
अपनो को दूर किया हकीकी जुबां रखकर

No comments:

Post a Comment