Wednesday, 9 November 2016

कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा

कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा
जाने  कब   भूखों  के  मुंह  निवाला  जायेगा

इमारतों के पीछे छिप  झाँकता रहता है सुरज
जाने कब मुफलिस बस्ती में  उजाला जायेगा

अभी है चंद लोग यहाँ  जो जिंदा है जमीर से
कब तक भला  ये भरम  यूँ ही  पाला जायेगा

नही पुछता भुखा  कभी भी  मजहब रोटी का
वो मस्जिद हो आयेगा  फिर शिवाला जायेगा

ठिठुरता रहा  इक बेचारा  झोपडी में रात भर
उसके पडोस से आज चढ़ावे दुशाला जायेगा

बिफरते हैं हर शाम बच्चे देख शहर में रोशनी
उलझे है कैसे दिन ढले  उन्हें संभाला जायेगा

शाम हुई घर को चले है जेब फिर से खाली है
उम्मीदों को फिर नये  झांसे में  डाला जाएगा

तसल्ली नही देते अब झुठी उम्मीदो के कतरे
जिंदा रहने अब नया तरीका निकाला जाएगाः

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