कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा
जाने कब भूखों के मुंह निवाला जायेगा
इमारतों के पीछे छिप झाँकता रहता है सुरज
जाने कब मुफलिस बस्ती में उजाला जायेगा
अभी है चंद लोग यहाँ जो जिंदा है जमीर से
कब तक भला ये भरम यूँ ही पाला जायेगा
नही पुछता भुखा कभी भी मजहब रोटी का
वो मस्जिद हो आयेगा फिर शिवाला जायेगा
ठिठुरता रहा इक बेचारा झोपडी में रात भर
उसके पडोस से आज चढ़ावे दुशाला जायेगा
बिफरते हैं हर शाम बच्चे देख शहर में रोशनी
उलझे है कैसे दिन ढले उन्हें संभाला जायेगा
शाम हुई घर को चले है जेब फिर से खाली है
उम्मीदों को फिर नये झांसे में डाला जाएगा
तसल्ली नही देते अब झुठी उम्मीदो के कतरे
जिंदा रहने अब नया तरीका निकाला जाएगाः
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