कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है
रिश्तों के निबाहों में तल्खियां दबी सी है
गुजरते हुए हयात के तजुर्बे रोज नये नये
वक्त के चंद लम्हो में नादानियां दबी सी है
दिलों के बाहर तो बहुत शोर सुनाई देता है
दिलों के भीतर में खामोशियां दबी सी है
बदचलन आवारा नींदे भटकती है रात भर
दर पर खड़े ख्वाबों में बेचैनियां दबी सी है
तहज़ीब के लिबास ओढ़े फिरे हैं यहाँ वहाँ
आज भी किरदार में नादानियां दबी सी है
दे दे कर जख्म पुछते है कि हाल कैसा है
उनके हर सवाल पर फब्तियां दबी सी है
दिली गुबार झाड़के शिकवे भंगार में देने है
एक इतवार में कित्ती मजबूरियां दबी सी है
वक्त की पोटली में कुछ लम्हें छुपाये रखे हैं
हर लम्हों में कितनी दुश्वारियां दबी सी है
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