Thursday, 28 July 2016

जब मिले बस वही बेकार की बातें

जब मिले बस वही बेकार की बाते
बेसबब बेफिजूल तकरार की बाते

अब नही होती चर्चा अम्न चैन की
अरसे से  सुनी नही  प्यार की बाते

फिजायें भी बेरंग सी लगने लगी हैं
अब नही होती है गुलजार की बाते

उस बस्ती मे चुल्हे अवकाश पर है
कैसे हो वहां कोई त्योहार की बाते

फुटपाथ पे यूँही बसर होती है अब
सुनते थे हम कभी घरबार की बाते

बदलती है शख्सियतें सुब्ह शाम में
कैसे करे कोई भी किरदार की बाते

हुकुमतें  तो फकत वादे खिलाती है
खोखली है सभी   सरकार की बाते

रसुखदारो की महज चलती है यहां
सुनी नही जाती है  लाचार की बाते

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