जब मिले बस वही बेकार की बाते
बेसबब बेफिजूल तकरार की बाते
अब नही होती चर्चा अम्न चैन की
अरसे से सुनी नही प्यार की बाते
फिजायें भी बेरंग सी लगने लगी हैं
अब नही होती है गुलजार की बाते
उस बस्ती मे चुल्हे अवकाश पर है
कैसे हो वहां कोई त्योहार की बाते
फुटपाथ पे यूँही बसर होती है अब
सुनते थे हम कभी घरबार की बाते
बदलती है शख्सियतें सुब्ह शाम में
कैसे करे कोई भी किरदार की बाते
हुकुमतें तो फकत वादे खिलाती है
खोखली है सभी सरकार की बाते
रसुखदारो की महज चलती है यहां
सुनी नही जाती है लाचार की बाते
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