Monday, 6 January 2020

सिसकते हुए मुस्कुराएँ कहाँ तक

122 122 122 122

सिसकते   हुए     मुस्कुराएँ    कहाँ तक
भरे  दिल   कहो   गुनगुनाएँ   कहाँ तक

सितारे  ही  गर्दिश  में है  जब कि अपने 
हिफाजत   करेंगी    दुआएँ    कहाँ तक

शिकायत  है  यूँ  तो   बहुत   जिंदगी से
मगर  हर  घड़ी  अब   बताएँ  कहाँ तक

बड़ा  खौफ  सा  आजकल  है  दिलों में
भला खुद को  अब  बरगलाएँ कहाँ तक

दिया  इक  मुंडेरो  पे  रख्खा  है  लेकिन
हवाओं  से   उसको   बचाएँ   कहाँ तक

चली है  अजब सी  सबा  मुल्क  में अब
अब अपने ही घर हम न जाएँ कहाँ तक

सलीबो  मे  लटकी  हर इक  जिंदगी  है
ये ख्वाब अब सुनहरे  सजाएँ  कहाँ तक

हर इक  मोड़  पर   हादसा   मुंतजिर है
अब हर दिन ये मातम  मनाएँ कहाँ तक

हवाओं  का  रुख फिर  दिखे हैं इधर ही
चरागों   से   दामन    बचाएँ   कहाँ तक

शिकायत शिकायत शिकायत शिकायत
भला  सर  वतन  अब झुकाएँ कहाँ तक

बहुत   हक बयानी   किये   जा  रहे  जो
कहें   फर्ज  अपना   निभाएँ   कहाँ तक

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