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सिसकते हुए मुस्कुराएँ कहाँ तक
भरे दिल कहो गुनगुनाएँ कहाँ तक
सितारे ही गर्दिश में है जब कि अपने
हिफाजत करेंगी दुआएँ कहाँ तक
शिकायत है यूँ तो बहुत जिंदगी से
मगर हर घड़ी अब बताएँ कहाँ तक
बड़ा खौफ सा आजकल है दिलों में
भला खुद को अब बरगलाएँ कहाँ तक
दिया इक मुंडेरो पे रख्खा है लेकिन
हवाओं से उसको बचाएँ कहाँ तक
चली है अजब सी सबा मुल्क में अब
अब अपने ही घर हम न जाएँ कहाँ तक
सलीबो मे लटकी हर इक जिंदगी है
ये ख्वाब अब सुनहरे सजाएँ कहाँ तक
हर इक मोड़ पर हादसा मुंतजिर है
अब हर दिन ये मातम मनाएँ कहाँ तक
हवाओं का रुख फिर दिखे हैं इधर ही
चरागों से दामन बचाएँ कहाँ तक
शिकायत शिकायत शिकायत शिकायत
भला सर वतन अब झुकाएँ कहाँ तक
बहुत हक बयानी किये जा रहे जो
कहें फर्ज अपना निभाएँ कहाँ तक
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