221 2122 221 2122
आंखों में लग के काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा
उम्मीद हो वफा की चादर से कैसे साहब
हालात हर कदम पर रूसवा जरुर होगा
हम आज अजनबी से जो शहर में है तेरे
रिश्ता कोई दहर से अपना जरुर होगा
खुश्बू महक ये कैसे यूँ खोने अब लगी है
अपनो के दरमियां ही धोखा जरुर होगा
ये जिक्र फिक्र तेरा ख्वाबों खयाल तेरे
कुछ इसके भी सिवा तो चर्चा जरुर होगा
सिक्कों की कद्र ज्यादा रिश्तों से हो गई जब
अपनो ने तंग आकर छोडा जरुर होगा
है रक्त में नहा कर अखबार आज आया
कल हादसा कहीं पर गुजरा जरुर होगा
अखबार मे ही भुखा रोटी लपेट लाया
संसद पटल में कल ये मुद्दा जरुर होगा
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