Saturday, 27 July 2019

नजर मिजाज नजरिया कि तल्खियां देखूं

नजर मिजाज नजरिया कि तल्खियां देखूं
उलाहनों  में   मुहब्बत   कहां कहां  देखूं

सितमगरी  में  वो  उस्ताद  हैं  जमाने में
कुछ ऐसे खबरों की मै रोज सुर्खियां देखूं

शरारतें  हैं  बहुत   उनकी  मुस्कुराहट में
लबों के जुम्बिशे इल्लत की शोखियां देखूं

वो हिचकियों में कहीं याद कर रहा शायद
खयाल  ख्वाब में  अब मै अना कहां देखूं

जरा सी आंच बची है जो दिल में रहने दो
दिली  तमन्ना है  हसरत  धुंआ धुंआ  देखूं

शरीक है वो मेरे  जिस्म में  महक बनकर
मै  बेखबर  हूँ  उसे  बस  यहाँ वहाँ  देखूं

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