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यूँ आंकड़ों से भूख भगायी न जायेगी
रोटी तसल्लियों से जुटायी न जायेगी
देखे सुनहरे ख्वाब है ता जिंदगी बहुत
ख्वाबों से अब ये आग बुझायी न जायेगी
बैठे हुए हैं घर पे ही दो माह हो गये
इस तरह उम्र और बितायी न जायेगी
कबतक दिलासे खुद को दें सब ठीक ठाक है
अब असलियत से आंख चुरायी न जायेगी
क्या कह रहे हो दिल पे लगाना न बात को
कुछ बातें उम्र भर ही भुलायी न जायेगी
लहजा मिजाज नाज नजरिया बकायदा
बरसों जहन से तल्खी मिटायी न जायेगी
लफ्फाजियों का दौर है इक और भी सही
पर यूँ फजीहतें तो करायी न जायेगी
कहने को कह गया है वो मै हूँ न साथियों
उस पर यकीं की राह बनायी न जायेगी
कुछ कर गुजरने वास्ते कुछ कर गुजर जरा
बातों से जिंदगी तो सजायी न जायेगी
मंहगे बहुत है ख्वाब तसल्ली सुकून के
लत ये फिजूल खर्ची लगायी न जायेगी
धोखा फरेब झूठ अलग बात है मियां
सच की बिना पे लूट मचायी न जायेगी
हर मोड़ पे है मुंतजिर इक हादसा नया
यूँ हादसों पे खुशियां मनायी न जायेगी
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