Friday, 15 May 2020

कभी मुद्दा कभी मसला रहा हूँ

कभी   मुद्दा    कभी    मसला   रहा हूँ
मै   अपने   आप में     उलझा  रहा हूँ

रहा   अपने   ही   घर  मैं अजनबी सा
भरे    बाजार      मैं     तन्हा     रहा हूँ

कि मन  उकता  रहा   अब फुरसतों से
मै   खुद   की  सोच में   उलझा रहा हूँ

जरुरत   तो    मेरी   भी   थी   मगर मैं 
नुमाइश    से   डरा    सहमा     रहा हूँ

लड़े   हम    उम्र भर    दैरो हरम    को
किये  पर  अपने  अब  पछता   रहा हूँ

न  समझे   अहमियत   चारागरी  कल
जरूरत   सबको   अब  समझा रहा हूँ

फिरे  वो     बांटते    जुगनू     शहर में
अंधेरा  ढांप     मैं    अपना     रहा  हूँ

बदलता  रहता   जो   हालात   पर  है
बड़ा   ढुलमुल  नजरिया   सा   रहा हूँ

ब मुश्किल अस्ल गम पर  आए आंसू
बिना  मतलब    यूँ  ही   रोता   रहा हूँ

छिपा  वो  मेरे  ही  भीतर  था  लेकिन
मै   पागल   दर ब दर   होता   रहा  हूँ

न  दो   खैरात   तुम  जुगनू   मुझे  यूँ
अंधेरा   मैं     जरा     गहरा    रहा  हूँ

फिर अपना अपना हिस्सा ले गये सब
मै  इक   अखबार   का   पन्ना  रहा हूँ

खुले  हैं   कौन से   जख्मों  के   टांके
यूँ  हरदम   ही   रफू   करता  रहा  हूँ

मेरी   जद्दोजहद   खुद   आप  से  है
मै  खुद  ही  को  उधड़ सी ता रहा हूँ

No comments:

Post a Comment