है नुमायाँ अब तो हर गम क्या करे
इस बिना पर आंखे पुरनम क्या करे
यूँ चुभे नश्तर जिगर में बारहा
अब कोई हाकिम या मरहम क्या करे
दफ्न कितनी ही कहानी हो गयी
सो गयी आंखे मुकद्दम क्या करे
है तसल्ली और दिलासा राएगा
दर्द अपना हो तो महरम क्या करे
इस अदा से कह गया वो अलविदा
ऐसे जिंदादिल का मातम क्या करे
जब लगेगी आग उट्ठेगा धुआँ
चुभती आंखों पे आलम क्या करे
जिंदगी के नाम पर धोखा हुआ
इस जरा सी बात का गम क्या करे
रोज ही है इक तमाशा जा ब जा
रोज इनका खैर मक्दम क्या करे
कर लिया अगवा किसी ने शर्म को
खो गया कमबख्त यकदम क्या करे
ढूंढ लेती है बहाने सुर्खियाँ
फिर गिला शिकवा यूँ पैहम क्या करे
उम्र भर किरदार बदलते हम रहे
खत्म किस्सा हो गया हम क्या करे
याद ने तेरी भिगोया इस कदर
बारिशों का कोई मौसम क्या करे
इश्तेहारों में भली है जिंदगी
पर हकीकत में है बेदम क्या करे
No comments:
Post a Comment