अपनी ही ख्वाहिशों से है बेजार आदमी
खुद के ही घर में जैसे हो अखबार आदमी
बंटता रहा जरूरतों के तौर उम्र भर
होकर के सफ्ह सफ्ह वो लाचार आदमी
बीतते तमाम वक्त ही रिश्ते समेटते
सबकी निगाहों में है गुनहगार आदमी
रहता है अपनो बीच भी गुमसुम सा मौन सा
तन्हाइयों का लगता है हकदार आदमी
पल में जरा सी बात पे बिखरा है राएगा
बनता बिगड़ता खुद से ही लाचार आदमी
उलझी हुईं हैं जात जमातों में जिंदगी
उल्फत के बीच बन गया दीवार आदमी
भागे फिरे है झूठ के पीछे तमाम उम्र
भुला सब अपने रीत वो संस्कार आदमी
इस चमचमाती दौरे तरक्की के दरमियां
बन कर के रह गया है इश्तेहार आदमी
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