क्यूँ तो बे वज्ह कोई घर से ही बाहर निकले
कुछ तो जज्बात संभाले जरा बच कर निकले
फिर पशेमान हुए जात जमातों के सबब
जाने क्या सोच के कुछ लोग यूँ दर दर निकले
बस यही सोच ने हमको है बनाया गूंगा
मेरी आवाज़ से अब कौन सा महशर निकले
अब तो रंगों के भी खुश्बू के भी तय है मजहब
आदमी माथे पे अब आदमी लिख कर निकले
आदमीयत भी लजाई है इस हरकत पर अब
रख के पहलू में ही कुछ यार जो खंजर निकले
अब नये दोस्त बनाते हुए डर लगता है
सैक्युलर कौम खबर क्या है कहाँ पर निकले
हम लरज़ते हुए लिख पाए दिली बात यहाँ
बरहना लोग यहाँ पर भी बराबर निकले
कोशिशें करते रहो दिल में भी उम्मीद रखो
कब किसी मोड़ से रब जाने दहर दर निकले
कुछ नई बात नई राह की उम्मीदें थी
मायूसी हाथ लगी आज वो बच कर निकले
फिरके उन्माद सभी छोड़ समझदार बने
दौर मुश्किल का है ऐसे ही न डर कर निकले
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