Friday, 3 April 2020

क्यूँ तो बे वज्ह कोई घर से ही बाहर निकले

क्यूँ  तो  बे वज्ह कोई  घर से ही बाहर निकले
कुछ तो  जज्बात संभाले जरा बच कर निकले

फिर   पशेमान   हुए   जात जमातों  के  सबब
जाने क्या सोच के कुछ लोग यूँ दर दर निकले

बस   यही   सोच  ने   हमको  है  बनाया  गूंगा
मेरी  आवाज़  से  अब कौन सा महशर निकले

अब तो रंगों के भी  खुश्बू के भी तय है मजहब
आदमी माथे पे  अब आदमी लिख कर निकले

आदमीयत  भी  लजाई है  इस हरकत पर अब
रख के पहलू में ही कुछ यार जो खंजर निकले

अब   नये   दोस्त    बनाते   हुए  डर  लगता है
सैक्युलर  कौम  खबर  क्या है कहाँ पर निकले

हम  लरज़ते  हुए  लिख  पाए  दिली  बात यहाँ
बरहना   लोग   यहाँ  पर  भी   बराबर   निकले

कोशिशें  करते  रहो  दिल  में  भी  उम्मीद रखो
कब  किसी  मोड़ से  रब जाने  दहर दर निकले

कुछ   नई   बात   नई   राह    की   उम्मीदें  थी
मायूसी  हाथ  लगी  आज  वो  बच कर निकले

फिरके  उन्माद   सभी   छोड़   समझदार   बने
दौर  मुश्किल  का है  ऐसे ही न डर कर निकले

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