Monday, 22 October 2018

खुलने लगी जुबां तो लगा जात का पता

खुलने लगी  जबां  तो लगा जात का पता
जाहिर  नकाब  कैसे हो जज्बात का पता

लहजा मिजाज  नाज नजरिया बदल गया
उनको  हुआ  हमारे  जो औकात का पता

लगती है सिसकियाँ  उसे शहनाई की तरह
अहमक बताए क्या भला  नग्मात का पता

किसने  चलाई  रस्म  ये  सौगात  की यहां
डरता  गरीब  सुन के  मुलाकात  का पता

गर्दिश  में हैं  सितारे  सभी  अपने वक्त के
तारों  के डूबने   से   लगा   रात  का पता

खोया हुआ  निजाम  तो  अपने ही मौज में
उसको  नही है  मुल्क के खंडरात का पता

बहते नही है आंसू  भी आंखों से आजकल
अखबार  में   छपे  नही  हालात  का पता

कोशिश  बाद  आती है  अब याद भी तेरी
मुद्दत  हुई है   भूले   खयालात   का पता

रखकर तो देख जलता दीया इक मुंडेर पर
मत  पुछ   बारहा   तू  यहां  रात का पता

दैरो हरम  की  बात  न कर  हमसे जिंदगी
वाईज  हमी  से  पुछे  खराबात   का पता

रस्ता बदल के  जाने वो ठहरी कहां है अब
अरसा  हुआ  है  भूले  ये  निशात का पता

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