212 212 212 212
चल रही है अजब सी हवा आजकल
हो गयी बे असर सी दुआ आजकल
घर के आंगन से बूढा शजर जो गया
चुभने सी लगी है शुआ आजकल
हसरतें हैं सुलगती रही उम्र भर
है जरूरी तकाजे जरा आजकल
खत्म होता नही जिंदगी का सफर
आदमी बस मुसाफत रहा आजकल
वक्त के साथ भर तो गये जख्म पर
दिखता है सदा दाग सा आजकल
रस्म सी रह गई है खुशियाँ सभी
अब न बाहम रहा राब्ता आजकल
दरमियां घर के दीवार की जो खड़ी
अब है भाई पडोसी नया आजकल
माँ ने दी सीख रोटी के बंटवारे की
बांट बेटों ने मां को दिया आजकल
आईना कल दिखाया उसे वक्त ने
है वो उलझा हुआ सा जरा आजकल
आस जिनसे थी कल रहबरी की हमें
बन के बैठे हैं वो तो खुदा आजकल
भूख रोटी पे चर्चे चुनावों में है
है यहाँ फिर ये मसला खड़ा आजकल
है फसादों की जड़ में ये दैरो हरम
आदमियत न मुद्दा रहा आजकल
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