Monday, 29 October 2018

सोंचकर सुकून था की जल्द ही घर आ गया


सोंचकर  सुकून था  की  जल्द ही घर आ गया
चलते चलते  रास्ते में  क्यूँ  ये  पत्थर  आ गया

दायरों  में  सिमटी  सी  ही  खयालें  सब मिली
तजकिरे में  बात ये  सब भी  उभरकर आ गया

जो परिंदा  छोड़कर  शब आशियां था चल दिया
वो सहर होते ही फिर से आज छत पर आ गया

सो रहा था  चांद  थक कर  खूब भागमभाग से
आंखें मलते  वो उठा  जो सुब्ह अख्तर आ गया

मुल्क  में  मेरे  खुदाओं  की  लगी  है  बाढ़ सी
आज तो  हर मोड़  पर ही  एक रहबर आ गया

है  सियासत  के  लिए  मुद्दा  फकत  दैरो हरम
फैसले  से आज  के ये  भी निकलकर आ गया

हादसों  के  दरमियाँ  इक  हादसा  ये भी हुआ
मन के भीतर आपके जो था वो बाहर आ गया

हुक्मरां था  मुब्तिला  इस  मुल्क  के  मेयार में
फिर कहां से  राह में  छप्पर ही छप्पर आ गया

मुल्क में  खुश्बू के  सौदागर  थे उनके वल्दीयत
आज क्यूँ बच्चों के हाथों  उनके पत्थर आ गया

सब फिजाओं  में जहर  सा बो रहे हैं आजकल
मुल्क में  कैसा  फकत  ये  दौरे मंजर  आ गया

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