हादसे बख्श दे मेरा ये शहर जाने दे
वक्त ने ढाए यहां खूब कहर जाने दे
लोग मिलते ही कहां अब है शहर में जिंदा
क्या अकेले मै करूं मुझको भी मर जाने दे
सांस लेना ही फकत जीने की निशानी है
है यही बात खरी बात अगर जाने दे
दैर के नाम पे उलझा न ये मसला इतना
दायरे सोंच के मजहब के ईतर जाने दे
लोग फुर्सत से नही अब है मिले मतलब से
हर किसी पे है यही आज असर जाने दे
ये वफाएं हैं महज आज किताबी बातें
ये हकीकत में नही आते नजर जाने दे
कल वो चौखट में रहे दिल ये लेकर अपना
क्या हुआ आज गया है जो मुकर जाने दे
रोते चेहरे को फकत पल में हंसा देते थे
अब गया हाथ से अपने ये हुनर जाने दे
ये सियासत को फकत वोट से ही मतलब है
बेबसी भूख से आवाम को मर जाने दे
झोपड़ी में है अंधेरा सा शहर जगमग है
बात ये खास नही यूं न बिफर जाने दे
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