तमाशा हुआ खत्म जोकर अकेले
थे किरदार ढेरों वो था पर अकेले
वो रोया है परदे के पीछे ही लेकिन
जमाने को हरदम हंसा कर अकेले
शिकायत ही करते रहे उम्र भर हम
गई जिंदगी हमको जी कर अकेले
शरारत बहुत हो गई जिंदगी अब
कभी तो हमे मिल तु आकर अकेले
मशक्कत किया जिंदगी भर ही उसने
है भटका जमाने में दर दर अकेले
वफाओं ने क्या खुब बदला दिया है
रहा शख्स बरसों ही बेघर अकेले
ढोता है बिचारा वो पत्थर अकेले
मशक्कत बड़ी वो रहा कर अकेले
हवाओं को भी आ गया फिर पसीना
दिया जलते देखा जो दर पर अकेले
वतन से बगावत दिलों में है नफरत
चला तो नही है वो पत्थर अकेले
यकीनन वजह भी बड़ी ही वो होगी
न करते बगावत यूं मर कर अकेले
जमाने को खुशियों की सौगात देकर
गया फिर बिचारा दिसंबर अकेले
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