Wednesday, 2 January 2019

तमाशा हुआ खत्म जोकर अकेले थे

तमाशा हुआ  खत्म  जोकर अकेले
थे किरदार  ढेरों  वो था पर अकेले

वो रोया है परदे के पीछे ही लेकिन
जमाने को  हरदम हंसा कर अकेले

शिकायत ही करते  रहे उम्र भर हम
गई  जिंदगी  हमको जी कर अकेले

शरारत  बहुत  हो  गई  जिंदगी अब
कभी तो हमे मिल  तु आकर अकेले

मशक्कत किया जिंदगी भर ही उसने
है भटका  जमाने  में  दर दर अकेले

वफाओं ने  क्या खुब  बदला दिया है
रहा  शख्स  बरसों  ही  बेघर अकेले

ढोता है  बिचारा  वो  पत्थर  अकेले
मशक्कत  बड़ी  वो  रहा कर अकेले

हवाओं को भी  आ गया फिर पसीना
दिया  जलते देखा जो दर पर अकेले

वतन  से  बगावत दिलों में है नफरत
चला  तो  नही है  वो  पत्थर अकेले

यकीनन  वजह भी बड़ी ही वो होगी
न करते  बगावत  यूं  मर कर अकेले

जमाने को  खुशियों की सौगात देकर
गया  फिर   बिचारा  दिसंबर  अकेले

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