Tuesday, 6 November 2018

दौर गुजरा है ये भी और हिसारों की तरह

दौर  गुजरा है  ये भी  और हिसारों की तरह
है  सुलगते  से  रहे  ख्वाब  शरारों की तरह

रोशनी  में  है   नहाया   ये  शहर  लगता है
क्यूँ  अंधेरा सा  है  बस्ती में गुबारों की तरह

हर तरफ  मुल्क में  जलसा है  हंसी मंजर है
झोपड़ी  आज भी  लगती है मजारों की तरह

पेट  की  आग  में  पकते  हैं  दिये  माटी के
ये  सबब  ही है  जरा मंहगे  हजारों की तरह

काश  वो  हमसे  कभी ये भी तो पुछे आकर
क्यूँ चले आते हो तुम ख्वाब में यारों की तरह

है  जियादा  ही   उमर  से  तो  तजरबा मेरा
जिंदगी  की  है  बसर  हमने बेदारों की तरह

कट  गई  फिर  वो  जुबानें  ही गुफ्तगू वाली
बात  चलने  है  लगी  जबसे इशारों की तरह

सुबह  से  शाम  तलक   हसरतें  सुलगती है
बीते हैं  जीस्त  ये अपनी तो इजारों की तरह

अब तो  हर एक ही  आमाल  पे आंसू आए
लग रही है ये खुशी  भी तो खसारों की तरह

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