Monday, 5 November 2018

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर   वो माटी   के घर में   माटी का दीप  हालत पे रो रहा है

कहां वो टिम टिम सी रोशनी में नहाके रातें निखर रही थी
कहां ये आंखों में चुभते से उजाले दर दर में हो रहा है

कहां गयी अब वो सौंधी खुश्बू ये नफरतों सा निकल रहा है
मुहब्बतों के फसल उगाए थे शूल बनकर चुभो रहा है

रहा वो माजी में खोए हर पल सुहाने दिन थे सुहानी राते
पुराने लोगों को है खबर अब वो मोल माटी के खो रहा है

ये बात शहरो में है मिली पर हमारे तहज़ीब ये नही है
अभी वो माटी की सौंधी खुश्बू से मन प्रफुल्लित हो रहा है

नसीब इन बिजलियों की देखो लिबास है कांच के बदन पर
हवा से पानी से लड़ के दीपक वजूद अपना ये ढो रहा है

शहर है रोशन मगर वो बस्ती में तो उजाला हुआ नही है
खयाल तक ये नही किसी को पड़ोस चुल्हा क्यूँ रो रहा है

खड़ा है सरहद पे लाल तेरा ए भारती मां तू फिक्र मत कर
इसी वजह से तो मुल्क मेरा बेफिक्र होकर के सो रहा है

सुना है अब के भी आ न पाया जो सरहदों पे गया है बेटा
लगी है आंखें कभी से दर पर के सब्र भी अब तो खो रहा है

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