अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर वो माटी के घर में माटी का दीप हालत पे रो रहा है
कहां वो टिम टिम सी रोशनी में नहाके रातें निखर रही थी
कहां ये आंखों में चुभते से उजाले दर दर में हो रहा है
कहां गयी अब वो सौंधी खुश्बू ये नफरतों सा निकल रहा है
मुहब्बतों के फसल उगाए थे शूल बनकर चुभो रहा है
रहा वो माजी में खोए हर पल सुहाने दिन थे सुहानी राते
पुराने लोगों को है खबर अब वो मोल माटी के खो रहा है
ये बात शहरो में है मिली पर हमारे तहज़ीब ये नही है
अभी वो माटी की सौंधी खुश्बू से मन प्रफुल्लित हो रहा है
नसीब इन बिजलियों की देखो लिबास है कांच के बदन पर
हवा से पानी से लड़ के दीपक वजूद अपना ये ढो रहा है
शहर है रोशन मगर वो बस्ती में तो उजाला हुआ नही है
खयाल तक ये नही किसी को पड़ोस चुल्हा क्यूँ रो रहा है
खड़ा है सरहद पे लाल तेरा ए भारती मां तू फिक्र मत कर
इसी वजह से तो मुल्क मेरा बेफिक्र होकर के सो रहा है
सुना है अब के भी आ न पाया जो सरहदों पे गया है बेटा
लगी है आंखें कभी से दर पर के सब्र भी अब तो खो रहा है
No comments:
Post a Comment