दिल को ये दिल्लगी नही आती
रोते हैं तो हंसी नही आती
ये सलीका मिला है बरसों में
यूं ही शाइस्तगी नही आती
शर्म को कर लिया कोई अगवा
वो नजर अब कभी नही आती
इक खिलौने की रह गई हसरत
लौट कर जिंदगी नही आती
घिर गई है इमारतों में वो
हम तलक धूप ही नही आती
आरजू हसरतें तमन्नाएं
आंख से बह गयी नही आती
आईना चांद जुल्फ अंगड़ाई
भूख के रहबरी नही आती
सलवटें जिंदगी की कैसी है
इस्तरी से सही नही आती
वो चरागां किया शहर फिर भी
मेरे घर रोशनी नही आती
दर्द को घूंट घूंट पीते हैं
ऐसे ही शायरी नही आती
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