Saturday, 17 November 2018

दिल को ये दिल्लगी नही आती

दिल को ये दिल्लगी नही आती
रोते हैं  तो   हंसी   नही आती

ये  सलीका  मिला है बरसों में
यूं  ही  शाइस्तगी   नही आती

शर्म को कर लिया कोई अगवा
वो नजर अब कभी नही आती

इक खिलौने की रह गई हसरत
लौट  कर  जिंदगी  नही आती

घिर  गई  है   इमारतों  में  वो
हम तलक  धूप ही  नही आती

आरजू     हसरतें      तमन्नाएं
आंख से  बह गयी  नही आती

आईना  चांद  जुल्फ   अंगड़ाई
भूख   के  रहबरी  नही  आती

सलवटें  जिंदगी   की  कैसी है
इस्तरी  से   सही    नही आती

वो चरागां किया  शहर फिर भी
मेरे  घर   रोशनी   नही  आती

दर्द   को    घूंट  घूंट   पीते  हैं
ऐसे  ही   शायरी   नही  आती

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