वहीं दिन है वहीं रात फिर नया क्या है
फकत तारीख के सिवा बदला क्या है
सहमे सहमे से लोग नजर आते है
चेहरों पर है उदासियां हुआ क्या है
दिन गया महीना गया साल गुजर गया
तेरी यादों के सिवा कुछ बचा क्या है
चंद लम्हो की सौगात अपने हक रही
वर्ना बचके तेरी नफरतों से रहा क्या है
सुब्ह फिर जिंदगी ढुंढने निकल पड़ा
हर शाम को घर पुछता है मिला क्या है
चेहरा मेरा बखूबी से पढ लेते हैं बाबूजी
परेशान देख पुछ ही लेते हैं हुआ क्या है
माँ ने हाथ फेरे मै मुश्किलात भुल गया
बेखबर रहे है हम इससे कि दुआ क्या है
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