Friday, 1 January 2016

वही दिन है वहीं रात फिर नया क्या है

वहीं दिन है वहीं रात फिर नया क्या है
फकत तारीख के  सिवा बदला क्या है

सहमे सहमे से      लोग नजर आते है
चेहरों पर है उदासियां     हुआ क्या है

दिन गया महीना गया साल गुजर गया
तेरी यादों के सिवा   कुछ बचा क्या है

चंद लम्हो की सौगात   अपने हक रही
वर्ना बचके तेरी नफरतों से रहा क्या है

सुब्ह फिर    जिंदगी ढुंढने निकल पड़ा
हर शाम को घर  पुछता है मिला क्या है

चेहरा मेरा बखूबी से पढ लेते हैं बाबूजी
परेशान देख पुछ ही लेते हैं हुआ क्या है

माँ ने हाथ फेरे मै   मुश्किलात भुल गया
बेखबर रहे है हम इससे कि दुआ क्या है

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