बस्ती के हर एक घर में उतर गई थोड़ी सी धुप
मेरा आंगन भुल जाने किधर गई थोड़ी सी धुप
अपने हिस्से उजियारे का एक टुकड़ा चाहा था
घने अंधेरों में छटपटा के मर गई थोड़ी सी धुप
दोपहर में तन्हा तन्हा भटक रहा था आफताब
छत पे इक कोने बैठी ठहर गई थोड़ी सी धुप
आरज़ू, अरमान, तमन्ना, रफ्ता रफ्ता दफ्न हुए
खुशियों के दामन में जो पड गई थोड़ी सी धुप
तंग दरारों के पीछे से झांकती है सब ख्वाहिशें
ऊंची दिवारों में दब कर रह गई थोड़ी सी धुप
रिश्तों की इक फटी चादर में चंद रिश्ते पाले था
कुम्हलाये सब रिश्ते जो उधर गई थोड़ी सी धुप
No comments:
Post a Comment