Saturday, 25 June 2016

बस्ती के हर एक घर में उतर गई थोड़ी सी धुप

बस्ती के हर एक घर में उतर गई थोड़ी सी धुप
मेरा आंगन भुल जाने किधर गई थोड़ी सी धुप

अपने हिस्से उजियारे का एक टुकड़ा चाहा था
घने अंधेरों में छटपटा के मर गई थोड़ी सी धुप

दोपहर में तन्हा तन्हा भटक रहा था आफताब
छत पे इक कोने बैठी   ठहर गई थोड़ी सी धुप

आरज़ू, अरमान, तमन्ना, रफ्ता रफ्ता दफ्न हुए
खुशियों के दामन में जो पड गई थोड़ी सी धुप

तंग दरारों के पीछे से झांकती है  सब ख्वाहिशें
ऊंची दिवारों में दब कर   रह गई थोड़ी सी धुप

रिश्तों की इक फटी चादर में चंद रिश्ते पाले था
कुम्हलाये सब रिश्ते जो उधर गई थोड़ी सी धुप

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