याद जमहूर की यूं ही तो न आई होगी
फिर से तारीख चुनावी निकल आयी होगी
फिर से मंडराने लगे गिद्ध सियासी देखो
गंध वोटो की यकीनन उन्हे आई होगी
ख्वाब फिर खूब दिखाएंगे सियासत वाले
झूठ के खेत में वादों की जुताई होगी
रोज जुमलों के नये बोल सुनाई देंगे
रोज खैरात की भी मुंह दिखाई होगी
फिर से जज्बात नुमाइश में रखे जाएंगे
मुल्क से आदमियत फिर से विदाई होगी
रंग पे जात पे फिकरे भी कसे जाएंगे
दरमियाँ दैर हरम खूब खिंचाई होगी
होंगें हमाम में नंगे तो सभी ही लेकिन
सबसे उजली है मेरी शर्ट लड़ाई होगी
दांव पे मुल्क की मेयार लगी है फिर से
फिर से इक बार फजीहत ये कराई होगी
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