शिकायत है अदावत है मुहब्बत भी जताते हैं
रवायत जिंदगी की यूँ लियाकत से निभाते हैं
नही है मुतमईन पर जिंदगी जीना तो है यारों
इसी बाइस ही हम कितने मसाइब भी उठाते हैं
कमर टूटी नही है तंगदस्ती है तो भी क्या गम
हमारे हौसले है हम इरादा ओढ़े आते हैं
मुसीबत में नही कोई नजर आता है दुनिया में
लगे अब मुस्कुराने तो हमारे यार आते हैं
हकीकत से जरा वाकिफ अब हम हो गए लोगों
मुखौटे है चढे सब ओर सब झूठे ये नाते हैं
चरागो को कहां कब तिरगी का भय सताता है
अंधेरों से निपटने वो उजाला ओढ़े आते हैं
सितमगर हैं बड़े शातिर चालाकी भी बेहद है
सताते हैं रुलाते हैं हमेशा आजमाते हैं
रही हरदम सवालों में मगर फिर भी तो अपनी है
भला अब जिंदगी का क्यूँ तमाशा हम बनाते हैं
ये जो तकलीफें हैं सब ही फकत उम्मीदें बाइस है
कभी हमको रही है तो कभी वो भी लगाते हैं
मेरे सुकूत का मानी न तू बेजा निकाला कर
परेशां हूँ जरा वरना मुझे भी बात आते हैं
कोई किरदार कैसा है नही परखा ये जा सकता
शहर में भेड़िये वहशी शराफत ओढ़े आते हैं
गरीबों की जो बस्ती है वहाँ चूल्हा बुझा सा है
जतन कुछ ऐसा करते हैं चलो चूल्हा जलाते हैं
इबादत औ जियारत से परे भी एक दुनिया है
अंधेरा है वहां आओ चरागां करके आते हैं
ये गुंगे बहरों की बस्ती यहाँ खामोशियां कायम
यहाँ जीने की शर्तें है अजल जीवन बिताते हैं
रकीबो के शहर से लौट कर आए हुए हैं हम
जलालत की अदावत की ये बचकानी सी बातें हैं
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